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लाल बत्ती पर
लाल बत्ती पर
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© Divik Ramesh

Children

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एक और कहानी कहूं। दिल्ली शहर। एक ठंडी शाम। दिसम्बर महीने की। सर्दी में ठिठुरते हुए सब। मैं भी। पापा-मम्मी और दीदी भी। कितने-कितने कपड़े तो पहने हुए थे हम। सिर से पाँव तक। तब भी ....। कार में थे। शीशे सब चढ़े हुए। इसलिए सर्दी नहीं लग रही थी। हम पापा के एक दोस्त की बेटी की शादी में जा रहे थे।

चौराहा। लाल बत्ती। हमारी कार रुकी हुई थी। मैं दीदी के साथ खेल रही थी। पीछे की सीट पर बैठे थे हम। मम्मी-पापा के साथ अगली सीट पर बैठी थी। मम्मी-पापा साथ हों तो बच्चों को पीछे की सीट पर बैठना चाहिए न। मेरी मम्मी  ने बताया था।

अचानक हमारे कार के बंद शीशे पर टकटक की अवाज आई। एक बार तो डर ही गई थी। छोटी हूं न इसीलिए। दीदी जितनी बड़ी हो जाऊंगी, तो मैं भी नहीं डरूंगी। देखा एक लड़की हाथ फैलाए हमारी कार की खिड़की के पास आ गई थी। उसका छोटा भाई भी साथ था। दोनों के बाल कितने गन्दे थे न! कपड़े भी। और कपड़े कितने कम भी थे। छोटे भाई के तो एक हाथ पर पट्टी भी लगी थी। शायद चोट लगी हो। लड़की ही बार-बार हमारे बंद शीशे पर टक टक कर रही थी। उंगली से । पर मम्मी-पापा कोई ध्यान नहीं दे रहे थे। वे अपनी बात कर रहे थे। लड़की ने तो चप्पल भी नहीं पहनी थी। पांव नंगे थे। भाई ने तो चप्पल पहनी थी। मैली सी।  "क्या उनको ठंड नहीं लग रही थी?" - मैंने सोचा। दीदी एक कागज पर ड्राइंग कर रही थी। वह तो बिज़ी ही रहती बस। कितनी तो ठंड थी। मैंने दीदी से पूछा, "दीदी इनको ठंड नहीं लग रही क्या? बाहर तो कितनी ठंड है न? ये बीमार हो जाएंगे न?" दीदी ने कहा, "मैं ड्राईंग कर रही हूं न? मम्मा से पूछ ले।" मैंने मम्मी से पूछा, "मम्मी देखो तो इन बच्चों को। क्या इन्हें ठंड नहीं लग रही? इतने कम कपड़े क्यों पहने हैं इन्होंने? लड़की ने तो चप्पल भी नहीं पहनी। क्यों मम्मी?"

मम्मी ने एक बार उन बच्चों को देखा। फिर मुंह मोड़ लिया। बोली, "ये गरीब हैं न? इनकी आदत होती है ठंड सहने की। पढ़े-लिखे भी नहीं हैं न। तभी तुम्हें कहती हूं कि खूब पढ़ा करो। नहीं तो तुम भी इन जैसे ही हो जाओगे। "मैं चुप हो गई।"

मुझे अजीब जो लगा था। मम्मी  तो हर बात को हमारी पढ़ाई से जोड़ देती है। कुछ और पूछती तो मम्मी फिर पढ़ाई की बात करने लगती। चाहती थी चुप ही रहूं। पर कहा, "मम्मी इन्हें कुछ पैसे दे दो न!" मम्मी ने कहा, "नहीं। इससे इनमें भीख मांगने की आदत पड़ जाएगी। कभी काम नहीं करेंगे। तुम इनकी तरफ ध्यान मत दो।" और मम्मी फिर पापा से बात करने लगी थी। मैं फिर चुप हो गई।

दीदी ने पूछा, "पापा लाल बत्ती कब तक रहेगी? मैं बोर हो गई हूं। कब चलेगी हमारी कार?" पापा ने कुछ नहीं कहा। वे भी तो हरी बत्ती होने का इंतज़ार कर रहे थे।

लड़की और उसका भाई अब हमारी कार के पास नहीं थे। इधर-उधर देखा तो देखा कि वे एक बस के पीछे उससे एकदम सट कर खड़े हुए थे। "बस चल पड़ी तो!" - मैंने सोचा। वे अपनी हथेलियां मल रहे थे। देखा वे दोनों बारी-बारी धुआँ निकलने वाले पाइप के पास हाथ करते थे और मलते थे। मैंने दीदी को दिखाया। दीदी ने बताया, "उन्हें सर्दी लग रही हैं न इसलिए गर्मी ले रहे हैं। धुएँ के पाइप से गर्म हवा जो निकलती है।" मुझे अच्छा लगा था। मैंने कहा, "दीदी! हरी बत्ती हो गई तो यह बस चल पड़ेगी न?" दीदी ने कहा, "हाँ।"

"दीदी अगर लाल बत्ती ही रहे तो कितना अच्छा हो न?"

दीदी बोली, "चुप! इनकी बात मत कर। मम्मी डांटेगी। मैं चुप हो गई। "कितनी बुद्धु और छोटी हूं न मैं?" - मैंने सोचा।

हरी बत्ती भी तो हो गई थी। और हमारी कार भी चल पड़ी थी।

 

     

 

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