मुझे कुछ करना है
मुझे कुछ करना है
नन्ही सी कुहू अपने किचन सेट के छोटे-छोटे बर्तनों में बड़े चाव से सब से पूछ पूछ कर सबकी पसंद का खाना बनाने का खेल खेल रही थी । सब लोग उसको खुश करने के लिए बहुत ही चाव से खाने की एक्टिंग कर रहे थे। कुहू को देखकर काव्या को अपना बचपन याद आ गया ।ऐसे गुड्डे गुड़िया का खेल खेलते खेलते कब वह बचपन पीछे छोड़ दुल्हन बन गई समय का पता ही नहीं चला।
उसकी शादी जल्दी हो गई थी इसलिए उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हो पाई थी।शादी के बाद घर गृहस्थी में व्यस्त हो कर अपनी पढ़ाई पूरी करने का उसका सपना अधूरा रह गया । वह दो प्यारे प्यारे बच्चों की मां बन गई थी ।बड़े बेटे ध्रुव और छोटी बेटी कुहू के साथ कैसे समय निकल जाता था उसको पता ही नहीं चलता था।बच्चों को पढ़ाते समय उसकोअपना शिक्षित होना सार्थक लगता था।तब उसको लगता था कि उसकी शिक्षा व्यर्थ नहीं गई ।ऐसे समय बीतता गया,दोनों बच्चे शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी में लग गए थे।बेटे की शादी हो गई।बहू घर में आ गई थी।बेटी का विवाह हो गया था,वह भी अपने घर परिवार में व्यस्त हो गई थी।अब काव्या का समय काटे नहीं कटता था ।अब उसको कुछ करने की ललक होने लगी थी। वो बचपन से ही पढ़ने लिखने में बहुत तेज थी लेकिन मौका ना मिलने के कारण सब छूट गया था।अब उसने एक बार फिर से लिखने की कोशिश की प्रारंभ में उसे लगा कि वह सब भूल चुकी है लेकिन प्रयास एवं प्रयत्न करते-करते उसने फिर से लेखन कार्य शुरू किया ।उसकी कविताएं और लेख सबको पसंद आने लगे तो उसका आत्मविश्वास भी बढ़ गया।उसकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं ।उसने जहां चाह वहां राह वाली कहावत को चरितार्थ कर दिखाया।
