पहली उड़ान

पहली उड़ान

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बब्बा सेवानिवृत्त हो चुके थे, उम्र ढलने लगी थी पर उनके ज्ञान का सागर अपने आप मे पूरे संसार के विद्वत्ता को खुद में समा लेने को तत्पर था। जब वह धाराप्रवाह बोलते थे तो लगता था मानो शब्द मोतियों की तरह सीपियों से खुद ब खुद बाहर आ रहे हों। अपनी पूरी ज़िंदगी उन्होंने माँ सरस्वती को समर्पित कर दिया शायद इसीलिए माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद से कुछ वंचित रह गए।

बब्बा ने हमेशा शहर और गाँव में वरीयता गाँव को ही दी। और बब्बा से लगाव के कारण हम भी गाँव से मन से ही जुड़े रहे। बचपन का वह दौर सिर्फ शैतानियों का होता था,पर बब्बा के अदालत में सारी शैतानियाँ माफ़ थी मेरे लिए।

मेरी उम्र के बच्चे अपने पिताजी की साईकल को पैर आड़ा करके बिना सीट पर बैठे चलाने लगे थे, इस युक्ति को बोलते थे, कैंची चलाना। जैसे कैंची कपड़े के ऊपर गर्म तवे पर बहते मक्खन के टुकड़े की तरह निकल जाती है उन बच्चों साईकल भी गाँव की पगडंडियों के ऊपर से खेतों, बगीचों, पोखरों और बाजार की ओर से मधुमक्खियों के झुंड की तरह निकल जाती थीं।

मेरा मन कचोट कर अमहर हो जाता था। सीखना तो मुझे भी था पर घर पर बब्बा की 1958 की पुरानी साईकल मेरी ऊंचाई से भी बड़ी थी। बब्बा ने उस साईकल को 2 रुपये 12 आना में खरीदी थी। घर मे सबके पास अपनी अपनी साईकल थी पर बब्बा की साईकल ही थी जिससे सीखने के लिए किसी को आपत्ति नही होती। उस साईकल के सामने न जाने घर के कितने साईकल या तो लापता हो गए या तो वीरगति को प्राप्त हो चुके थे पर उस बुढ़िया साईकल के रौब के आगे अन्य साईकलें नतमस्तक थे।

जंग कब भूरे रंग की उस साईकल की सवारी जब बब्बा करते थे तो लगता था स्वयं महाराणा प्रताप अपने चेतक पर सवार होकर अपने साम्राज्य की सैर पर निकल पड़े हों।

आज रविवार था, एक दिन उत्साह से भरा हुआ। सुबह बब्बा कहीं निकलने को तैयार हो रहे थे। मैंने भी उनसे उनके साथ चलने की इच्छा जाहिर की तो बब्बा ने अपने साथ चलने के लिए अनुमति प्रदान कर दी। बब्बा ने मुझे अपने साईकल पर बिठा ख़ुद साईकल हांकने लगे। गाँव से सरपट निकल कर हम बरनी गाँव उनके मित्रवत गुरु ‘पण्डित सीताराम पांडेय’ के यहाँ आ पहुंचे। उनके गुरु पूर्णतया मृत्यु शैया पर थे, पर उनका नेतृत्व एक अध्यापक की तरह सबको अनुशासन का पाठ करने को प्रेरित कर रहा था।

सभी लोग जमीन पर बिछाई दरी पर बैठे थे, पण्डित जी अपने सिंहासन यानी कि अपने तख्त पर बैठे थे और वह दृश्य एक राज दरबार की तरह जान पड़ता था। बब्बा के पहुंचने पर सारे लोग खड़े होकर बब्बा से आशीर्वाद लेने लगे। बब्बा ने पंडित जी को दण्डवत प्रणाम किया और पंडित जी ने बब्बा को उनके तख्त पे बैठने का आदेश दिया। बब्बा एक छात्र की तरह उनके पास बैठ कर उनसे कुशल क्षेम करने लगे।

आज पंडित जी के यहां ‘बाटी चोखे’ का आयोजन था, बब्बा के आने के पश्चात सभी लोग बाटी चोखे की तैयारी में जुट गए।

कोई कंडे को सुलगा रहा था तो कोई आंटा गूंथ रहा था तो कोई प्याज काटने छांटने में व्यस्त हो गया। 2 धुनि बनाई गई। एक पर मिट्टी के हंड़िये में दाल पक रही थी एक पर गहरे बैंगनी रंग के बैंगन आग पर अपने आप को कुंदनिका रूपी रंग में सराबोर कर रहे थे।

दाल बनाने वाले रसोईये को पंडित जी के सख़्त आदेशों को पालन करते हुए आगे बढ़ना पड़ रहा था और ज़रा सी भूल पर फटकार का भी सामना करना पड़ रहा था। पंडित जी तख्त पर से अपने आदेश दाल बनाने के लिए प्रेसित कर रहे थे। अंत मे उन्होंने अपने हाथ से 2 गुड़ के टुकडे डाले और सबको भोजन के लिए आमंत्रित किया। दाल, चावल, चोखा, शुद्ध घी में डूबी हुई बाटियों को देख के भूख अपने पूरे उफान पर था।

पांत में बैठने पर सबको पत्तल में भोजन और मिट्टी के कुल्हड़ में भोजन प्रदान किया गया। छक कर भोजन करने के पश्चात हम वापस अपने घर की ओर आ गए।

बब्बा ने अपनी साईकल को द्वार पर नाथ दिया। उनकी साईकल बड़े रौब से द्वार की शोभा बढ़ा रही थी। मेरा मन बार बार उस साईकल को चलाने की गुहार कर रहा था पर अपनी उम्र और छोटे कद की वजह से नन्हे कदम बारम्बार पीछे खिंचे चले आते थे।

मैंने पूरे हिम्मत के साथ साईकल को उसके स्टैंड से उतारा और सीढ़ियों की मदद से सीट पर बैठ गया। उसके पैडल पर रखकर सन्तुलन बनाते हुये ज़ोर से धक्का दिया। मुर्छितावस्था में पड़ी साईकल में मानो नई स्फूर्ति का संचालन होने लगा, साईकल गतिमान हो उठी। हाथ, पैर और दिमाग का जबरदस्त तालमेल का बेहतरीन मिश्रण साईकल को सही दिशा में जाने को बाध्य कर रहा था।

मन प्रफुल्लित हो रहा था, डर रूपी अंधेरा उस स्फूर्ति से छंटता चला जा रहा था। धीरे धीरे मैं अपने चौखट से आगे निकल गया पर उस साईकल को रोकने के बारे में तो मैंने कुछ सोचा ही नही था। पैडल लगातार चलते हुए यह सुनिश्चित कर रहे थे कि मैं गिरने से बचा हूँ। सामने कूड़े का एक ढेर था, आसपास गोबर के उपले पड़े थे और मैने अपनी साईकल उपलों में रेल दी।

तड़ाक!!

साईकल लेके मैं औंधे मुंह गिर पड़ा, मैं एक तरफ गिरा और साईकल दूसरी ओर। पर गिरने का तनिक भी अफसोस न हुआ। मैंने साईकल उठायी और ढेर के ऊपर से दौड़ते हुए लपककर साईकल पर बैठ गया। अब सबकुछ मेरे मर्जी से हो रहा था। थोड़ी दूर साईकल को फिराते हुए मैं द्वार पे बने सीढ़ियों के सहारे उतर गया।

ऐसा महसूस हो रहा था मानो वायुयान को अभी अभी कप्तान नीचे उतार कर राहत की सांस ले रहा हो।


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