विश्वास
विश्वास
महेश और प्रिया दोनों जिंदगी में बेहद खुश थे। सब कुछ था उनके पास पद, पैसा और पहुँच भी। और सबसे बड़ी बात एक दूसरे के लिए प्यार,सम्मान, विस्वास। मित्रों, ये वे आधार स्तम्भ हैं जिनके सहारे घर बसता है, विवाह टिकता है। महेश के इस प्यारको कुछ लोग 'मेडुवापन'कहते थे तो महेश इसे 'असल मर्दानगी'। जो आदमी अपनी जीवन साथी का सम्मान, विस्वास नहीं कर सकता वो दूसरे की करेगा इसकी क्या गारंटी ?
हाँ, तो लगभग चालीस बछर का महेश चिकित्सा विभाग में एक अधिकारी के पद पर कार्यरत था। उसका काम था विभिन्न क्षेत्रों का दौरा करना और कई कार्यक्रम कराना। जब कभी भी वह दौरे पर होता तो उसकी हमराह प्रिया उसकी खोज खबर करती रहती ''कहाँ पहुँचे हैं जी ? कुछ नास्ता पानी कर लेना जीथोड़ा जल्दी आ जाना जी।" मोबाइल उनके पिता जी के पास भी था लेकिन बेटे की पूरी जिम्मेदारी वह बहू को सौप चुका था। लोग आम तौर पर समझते हैं कि बेटी के माँ- बाप दामाद के हाथों अपने कलेजे की टुकड़ा बेटी को सौप देते हैं लेकिन लोग भूल जाते हैं कि एक बेटे के माँ बाप भी अपना हीरा बेटा अपनी बहू को सौप कर निस्फिक हो जाते हैं।
एक दिन की बात है। महेश ऐसे ही दौरे पर निकला था। ऐसे क्षेत्र में था कि नेटवर्क के सारे दावे झूठे हो गए थे। न जिओ न एयरटेल, सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम। महेश खासा परेशान रहा क्योंकि सारे जानकारी व्हाट्सएप के माध्यम से लेना देना रहता था।
इंसान के बनाये टेक्नोलॉजी इतना हावी हो गया है कि इंसान की कोई आवश्यकता ही नहीं रही।
महेश किसी तरह नेटवर्क में आकर अपने सारे जानकारी लेन-देन कर शाम को घर पँहुचा। रोज की तरह प्रिया उसे मुस्काती पानी दी। महेश रूम में कपड़े उतार रहा था। वहीं पर प्रिया बच्चों के पकड़े घरी मार रही थी। बातों बात में पूछी ''आज किस गांव में गए थे जी टॉवर ही नहीं था ?" "अरे मत पूछ जी,मैं तो परेशान ही हो गया था, टॉवर के बदले जलेबी बन रहा था मोबाइल पर गोल -गोल।" महेश परेशान सा बताया।
"तभी तोमैं इतना कॉल की जी कि लगा ही नहीं। खाली बंद या कवरेज से बाहर बता रहा था।" प्रिया बतायी। महेश उस पल को याद नहीं करना चाहता था। चुप रहा। अचानक ससंक उसकी ओर देख कर पूछा "तुमने कॉल की थी ?" ''तो जीकई बार।" प्रिया मुस्काती हुई बताई। " तो फिर मिस कॉल मेसेज आया नहीं कैसे ? बाकी कई जनों का तो आया है नेटवर्क में आते ही।" महेश की आवाज में तल्खी आ गया था इस बार। "तो जीनहीं पतियाते तो।" प्रिया, वहीं बिस्तर पर पड़े अपनी चुंटी मोबाइल उठाकर दिखाने की कोशिश कर रही थी कि महेश बीच में ही बिल्ली सा काट दिया " बस, फालतू कचर मत कर।
तुम मुझे बहुत प्यार करते हो,मैं तुम्हे, ये सच है। लेकिन ज्यादा दिखाने की कोशिश मत किया कर जीकॉल तो की नहीं थी और सेखी मार रही है फालतू हूँ हजा चाय बना टेंसन मत दे फालतू।" महेश तवे सा गर्म हो गया था। बेचारी प्रिया अपनी बात और हाथ कछुआ सा समेट कर चाय बनाने चली गई।
चाय बनाती -बनाती सोचती है " हे भगवान! ये कैसा विकास है ?
कैसा युग है टेक्नोलॉजी का कि इंसान से ज्यादा इंसान के बनाये टेक्नोलॉजी पर विस्वास होता है। हे भगवान।" प्रिया की आँखें भर आयीं। और इधर ? महेश, मोबाइल को सामने रखे टी टेबल पर रख,कुर्सी पर लेटा हुआ था कि गूँ गूँ मोबाइल में मेसेज का संकेत हुआ। महेश ऐसे ही देखा। क्या ? "यू हैव सेवेन मिस्ड कॉल्स फ्रॉम प्रिया ।" महेश भौचक रह गया। उसका देह देखते-देखते पीला पड़ गया। पसीना-पसीना हो गया। इधर -उधर देखा और झट से मेसेज डिलीट कर दिया। " क्या हो गया जी ? कुछ परेशान सा लग रहें हैं ?" चाय लेकर आती प्रिया में पूछा। "कुच्छ नहीं जी बस यूँ ही थकान लग रहा है ।" महेश चाय की चुस्की लेकर बोला " इतना कह रही हो तो कॉल की होगी तुमने।"
