विश्वास या अंधविश्वास
विश्वास या अंधविश्वास
अनुभव एक छोटा सा है, बात बड़ी गंभीर है। कुछ वर्षों पूर्व की बात है। मथुरा में एक प्रख्यात संत के समागम में जाने का अवसर प्राप्त हुआ पता चला महात्मा बड़े चमत्कारी है । संत ऐसा भी बताते हैं कि सारे कष्ट पल में खत्म, ना कोई टोना, ना कोई टोटका, बस संत शक्ति का प्रादुर्भाव। मन उत्साहित हो उठा, चलो! चलते हैं।
तो आगे की कथा थोड़ी गंभीर है। सायं 6:00 से संत की कथित समागम, सत्संग चालू होना था। हम 5:00 बजे कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। प्रवेश द्वार पर हमें पता चल गया था कि हमारे जैसे दुखियारे सिर्फ हम ही नहीं हैं- करोड़ों है !
भीड़ का सैलाब बढ़ता गया,अंदर बताया गया कि खुले मैदान में हमें आसन पर और पीले वस्त्र पहन कर बैठना है | चिंता मत कीजिए सब चीजे जो आप के सत्संग में शामिल होने की पात्रता को पक्का करते हैं - ₹500 की छोटी सी कीमत में उपलब्ध है, और खरीदना जरूरी है, वरना फल नहीं मिलेगा।
तो जी कथित पवित्र व्यापार का प्रथम चरण शुरू। रात होने लगी थी। मैदान जगमग आ रहा था। पवित्र महात्मा जी का मंच फूल और रोशनी से ओत प्रोत आभामय खिंचाव उत्पन्न कर रहा था। हम भी झोली पसारे बैठे थे। महात्मा जी के दर्शन को व्याकुल नैन और सांसारिक पीड़ाओं से विदीर्ण मन का चैन लिए।
रात 9:00 बजे महात्मा जी पधारे अपने साथ सैकड़ों चेलो और भक्तगण की सेना के साथ। कई प्रसिद्ध फिल्मी सितारे भी उनकी शोभायात्रा के चांद बने हुए थे अब यह नहीं पता कि वह पेमेंट से आए थे या भक्ति से। तमाम माल्यावर्ण और प्रशंसाओ की औपचारिकताओं को देखकर मन ने पूछा- किसी संत समागम में आया है या राजनीतिक सभा में ...
खैर चमत्कारों की आपबीती सुनाने की नंबर वाइज युवा, युवती, बूढ़े,बुढ़िया एक एक करके मंच पर आए और बताने लगे कि किस तरह उनका फलां फलां रोग इन संत की कृपा से खुद ही मर गया। किसी की नौकरी की प्राप्ति, किसी की शादी का बैंड, और किसी की 25 या 30 वर्षों की संतानहीनता का निवारण संत जी के श्रये लिस्ट का हिस्सा था, सुनते सुनते ऊब होने लगी। सच्चाई का असर थोड़ा कम सा लगा। फिर संत जी का नंबर आया। आत्मा और कान एकाग्र कर एक इंद्री के रूप में संगठित करके सुनने लगी। यहां उनके लिखे मंत्र तो उनकी पुस्तकों में पड़े हैं ओर उन्हीं मंत्रो के जाप से आप पा सकते है अपनी मुसीबतों का अंत !
इसी बीच एक चमत्कारी लीला का अनुभव भी देखने को मिला । संत जी कुछ चेले लिए एक बड़ी कपड़े की जोड़ी बनाए मैदान में घूमने लगे एक भव्य राम मंदिर की स्वर्ण मूर्ति के लिए सोना दान करने की अपील नुमा आदेश के साथ ... देखते ही देखते भीड़ ने अपने गले में पड़ी सोने की चेन हाथ से अंगूठी चूड़ी तक निकालकर उस झोली में डालने शुरू कर दिए 15 मिनट के अंदर वह झोली सोने के आभूषणों से भर गई संत जी ने एक विशाल उच्चारण के साथ कार्यक्रम समापन की घोषणा की !
और अपने पीछे छोड़ दिया एक गंभीर प्रश्न विश्वास या अंधविश्वास जरा सोचिएगा धन्यवाद !
