रुधिर: एक प्रेम कहानी
रुधिर: एक प्रेम कहानी
अध्याय 1: वीरेंद्र वर्धन की क्रूर नीति
महल के आलीशान गलियारे आज खामोश थे, लेकिन हवा में मौत की गंध तैर रही थी। स्वर्णजड़ित खंभों पर मशालें कांप रही थीं, जैसे वे आने वाली तबाही से डर गई हों।
साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली राजा, महाराज देवव्रत आज अपने ही महल के गर्भगृह में खून से लथपथ पड़े थे। उनके सीने और पीठ पर गहरे घाव थे, जिनसे बहता लाल रक्त संगमरमर के सफेद फर्श पर फैलकर एक खौफनाक नक्शा बना रहा था। सांसें उखड़ रही थीं, लेकिन आँखों में अपनी पत्नी को बचाने की आखिरी तड़प बाकी थी।
ठीक उनके सामने खड़ा था काल का दूसरा रूप—वीरेंद्रवर्धन। वह कोई और नहीं, देवव्रत का साला और महारानी देवयानी का सगा भाई था। वीरेंद्रवर्धन के हाथ में मौजूद भारी तलवार से टप-टप करता खून फर्श पर गिर रहा था। उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं, बल्कि सत्ता की भूख और अंधा पागलपन था। उसने अपनी भारी बूट देवव्रत की घायल छाती पर रखी और अपनी चमचमाती तलवार की नोक राजा की गर्दन पर टिका दी।
"खत्म हुआ तुम्हारा शासन, देवव्रत!" वीरेंद्रवर्धन की आवाज महल की दीवारों से टकराकर गूंजी। उसकी हंसी में एक अजीब सा खौफ था।
तभी कक्ष का भारी दरवाजा खुला। महारानी देवयानी हांफती हुई भीतर दौड़ीं। अपने सुहाग को इस हालत में देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके आंसू थम गए और चेहरे पर खौफ छा गया। "भैया! यह क्या अनर्थ कर रहे हो तुम? अपने ही जीजा पर तलवार उठा ली?" देवयानी चीखीं।
वीरेंद्रवर्धन ने पलटकर अपनी बहन को देखा। उसकी क्रूर मुस्कान और गहरी हो गई। "भैया? आज के बाद इस जीभ से यह शब्द मत निकालना देवयानी! इस सिंहासन पर सिर्फ मेरा हक है, और जो इसके बीच आएगा, वो मिटा दिया जाएगा।"
फर्श पर तड़प रहे राजा देवव्रत ने अपनी पूरी ताकत समेटकर चिल्लाकर कहा, "देवयानी! भागो यहाँ से! इसके बहकावे में मत आओ... यह राक्षस बन चुका है। हमारा... हमारा मासूम बच्चा... इसने उसे भी नहीं छोड़ा! उसने हमारे पहले बच्चे को मार दिया देवयानी! भागो, अपनी जान बचाओ!"
"क्या?!" देवयानी के कानों में जैसे बिजली कड़क गई। उनके कलेजे के टुकड़े, उनके पहले बच्चे की हत्या हो चुकी थी? ममता का आंचल पलभर में उजड़ चुका था।
वीरेंद्रवर्धन जोर से हँसा। उसकी आँखों में छुपा शैतान पूरी तरह बाहर आ चुका था। वह चीखा, "हाँ देवयानी! सही कहा इसने। मैंने तुम्हारे कुल के दीपक को बुझा दिया है। आज इस महल में खून की वो नदी बहेगी जो तुम्हारे पूरे वंश को बहा ले जाएगी! मैं तुम्हारे पूरे परिवार को जड़ से नष्ट कर दूंगा! कोई नहीं बचेगा!"
यह सुनते ही देवयानी के भीतर का खौफ अचानक एक भयानक गुस्से और प्रतिशोध में बदल गया। उन्होंने अपनी सूजती हुई आँखों से अपने भाई को देखा—अब वह भाई नहीं, उनके सिंदूर और गोद का कातिल था। देवयानी ने समझ लिया कि यहाँ रुकने का मतलब मौत है और अगर वह मर गईं, तो इस महापाप का बदला कौन लेगा?
बिना एक पल गंवाए, देवयानी ने अपने लहंगे को कसकर पकड़ा और पीछे मुड़कर महल के अंधेरे गुप्त रास्तों की तरफ भाग खड़ी हुईं।
बाहर प्रकृति ने भी अपना रौद्र रूप धारण कर लिया था। रात इतनी घनी और अंधेरी थी कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। आसमान में काले-कलावंत बादल इस कदर गरज रहे थे, मानो युद्ध के मैदान में विनाश के भयंकर ढोल बज रहे हों। बादलों की उस गड़गड़ाहट के बीच रह-रहकर बिजली इस तरह कड़कती, जैसे आसमान चीरकर धरती पर गिर जाएगी। मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी। पानी की मोटी बौछारें देवयानी के चेहरे पर हथौड़े की तरह लग रही थीं, लेकिन उनके पैर नहीं थमे।
जैसे ही देवयानी ने घने और खौफनाक जंगल में कदम रखा, मुश्किलें हजार गुना बढ़ गईं। राजसी वैभव में रहने वाली महारानी के कोमल पैरों में जूते नहीं थे। नंगे पैर भागते हुए ज़हरीले और नुकीले कांटे उनके पैरों में गहरे चुभ रहे थे। हर कदम के साथ उनके पैरों से लाल रुधिर (खून) बह रहा था, जो कीचड़ और बारिश के पानी में मिल रहा था। दर्द से उनकी चीख निकल रही थी, लेकिन वह रुक नहीं सकती थीं।
अंधेरे झाड़ियों के बीच से भयंकर ज़हरीले सांप और बिच्छू रेंग रहे थे, जो बिजली की रोशनी में पलभर के लिए दिखाई दे जाते। सिर के ऊपर और आसपास से जंगली भेड़ियों और हिंसक जानवरों के रोने और गुर्राने की डरावनी आवाजें गूंज रही थीं, मानो पूरा जंगल ही उन्हें निगल जाने को तैयार हो। एक तरफ खूंखार जानवर थे और दूसरी तरफ जान लेने पर उतारू सगा भाई।
इस भयंकर कड़कती बिजली और मूसलाधार बारिश में भागते-भागते अचानक देवयानी को याद आया कि उनका वंश पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उनके पेट में एक और नन्हीं सी जान पल रही थी—वह दोबारा माँ बनने वाली थीं! उनका एक बच्चा भले ही महल में मार दिया गया हो, लेकिन उनके भीतर अभी भी राजा देवव्रत का दूसरा अंश सुरक्षित था।
यह एहसास होते ही रानी के भीतर एक अलौकिक शक्ति आ गई। उन्होंने भागते हुए अपना एक हाथ कसकर अपने पेट पर रख लिया ताकि उनके होने वाले बच्चे को कोई आंच न आए, और उनका दूसरा हाथ कमर पर बंधी नुकीली कटार पर कस गया।
उधर महल में वीरेंद्रवर्धन ने देवयानी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अपने क्रूर मुख्य सेनापति कृतवर्मा को आदेश दिया। सेनापति कृतवर्मा हाथ में जलती हुई मशालें और नंगी तलवारें लिए 10 खूंखार सैनिकों के साथ देवयानी के पीछे घने जंगल की तरफ दौड़ पड़ा। घोड़ों के टापों की आवाज और सैनिकों की चीखें देवयानी के करीब आने लगीं।
तभी जंगल के एक संकरे और घुमावदार रास्ते पर तीन सैनिकों ने देवयानी को आगे से घेर लिया। रानी के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। लेकिन इस समय वह सिर्फ एक बेबस औरत नहीं, बल्कि अपने अजन्मे बच्चे की रक्षा करने वाली एक कालिका थीं। जैसे ही पहले सैनिक ने तलवार उठाई, देवयानी ने बिजली की फुर्ती से अपनी कटार निकाली और उसके गले को चीर दिया। सैनिक तड़पकर कीचड़ में गिर गया। बाकी दो सैनिक संभल पाते, इससे पहले ही देवयानी ने पैंतरा बदला और अपनी कटार एक के सीने में उतार दी और दूसरे की छाती को चीरते हुए पार कर दिया।
पलक झपकते ही ३ सैनिक खून से लथपथ होकर जमीन पर ढेर हो चुके थे। बाकी बचे ७ सैनिक और सेनापति कृतवर्मा यह खौफनाक मंज़र देखकर एक पल के लिए ठिठक गए। देवयानी ने अपने पेट पर हाथ रखा, उन पर एक क्रूर नज़र डाली और अंधेरी रात के सन्नाटे में जंगल की गहराइयों की तरफ गायब हो गईं।
उपन्यास 'रुधिर' की यह गाथा अब शुरू हो चुकी थी...
