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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Comedy

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हरि शंकर गोयल "श्री हरि"

Comedy

पत्नीम् शरणं गच्छामि

पत्नीम् शरणं गच्छामि

6 mins
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चूड़ियों की खन खन की आवाज सुनकर आज सुबह जैसे ही मैं जागा तो सामने श्रीमती जी का मुस्कुराता हुआ चेहरा नजर आया । जब जब भी हमें उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा सुबह सुबह दिखाई देता है , वह दिन हमारे लिए अद्भुत बन जाता है । आज फिर से दिन बन गया था हमारा । भई वाह ! हमारे मुंह से निकला और हमने एक हाथ से उन्हें पकड़ कर जैसे ही एक हल्का झटका देकर अपनी ओर खींचा , वे इजरायल के मिसाइल अटैक से ध्वस्त फिलीस्तीनी इमारत की तरह हमारे ऊपर धप्प से गिर पड़ीं । हम कुछ और शरारत करते उससे पहले ही वे झट से उठ खड़ी हुई और पहेलियां पूछते हुए बोली

" बताओ आज क्या है " ?

हम मर्दों का दिमाग सुबह-सुबह चलता ही कहां है ? जब तक "बेड टी" और अखबार रुपी "नाश्ता" नहीं मिले तो दिमाग "सुन्न" सा रहता है । और ऊपर से जब सामने चांद सा चेहरा दिखाई दे तो दिमाग बिल्कुल सुन्न हो जाता है । हमारी सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी इसलिए हमने सीधे सपाट शब्दों में कहा

"पहेलियां क्यों बुझा रही हो , सीधे सीधे ही बता दो न कि आज क्या है" ?

उसे हमारी बातों पर विश्वास नहीं हुआ । कन्फर्म करने के लिए पूछा

" सच में आपको पता नहीं है" ?

अब खतरे की घंटी बज चुकी थी । अगर अभी भी नहीं बताया तो अब हमारा कोर्ट मार्शल होना तय था । मैं मन ही मन सोचने लगा कि आज क्या हो सकता है ? मैंने अपने दिमाग की सारी बत्ती एक साथ जला लीं । श्रीमती जी का जन्मदिन ? नहीं , वो तो फलां तारीख को आता है । फिर एनीवर्सरी ? नहीं , वो "अमुक" तारीख को आती है । फिर बच्चों के बर्थ डे ? नहीं वो भी नहीं हैं । फिर क्या हो सकता है ? कहीं से कोई क्लू नहीं मिल रहा था । अंतत: हमने हथियार डालते हुए कहा

"डार्लिंग , आपकी तरह ही अगर बुद्धिमान होते तो पता नहीं हम क्या होते ? आप जैसी बुद्धि कहां दी है हमें भगवान ने ? अब पहेलियां पूछना बंद कीजिए और आप ही हमारा मार्गदर्शन कीजिए कि आज आखिर है क्या जो सुबह सुबह हमारा दिमाग खाये जा रहा है" ?

यह बात सुनकर श्रीमती जी की बांछे खिल गई। स्त्रियां हमेशा ही अपनी प्रशंसा सुनने के लिए लालायित रहतीं हैं । कभी अपने सौन्दर्य की, कभी बुद्धिमत्ता की और कभी अपने काम की । हम पति लोग तो बने ही उनकी प्रशंसा के लिए हैं । बस, उनकी प्रशंसा करते जाओ और अपने सारे काम निकलवाते जाओ । अपना प्रशस्ति गान सुनकर वे फूल कर कुप्पा होते हुए बोलीं

"आज मेरे मम्मी पापा की एनीवर्सरी है ना ! ये भी भूल गए ? इतना तो याद रखना चाहिए था ना" ?

अब इन्हें कौन समझाए कि "हम अपनी एनीवर्सरी ही न जाने कैसे याद रख पाते हैं ? फिर सास, ससुर की एनीवर्सरी कौन याद रखेगा ? और हां , हमारे ससुर साहब को ही कौन‌ सी याद होगी आज की तारीख" ? पर यह बात कहने से घर का माहौल हमारे चेहरे का नक्शा बिगड़ने का पूरा अंदेशा था इसलिए हमने कहा

"सॉरी यार , भूल गया था । बताओ इसे कैसे सेलिब्रेट करना है" ? थोड़ा मस्का लगाने में हमें भी आनंद आने लगा था ।

हमारी बात सुनकर वह एकदम से चौंक कर बोली " करना क्या है , ये भी मैं ही बताऊंगी क्या ? आप ही सोचो कोई नया आइडिया । वैसे तो बड़े लेखक बने फिरते हो , पर एक ढंग का आइडिया भी नहीं सोच सकते" ? हमारा सत्यानाश करने के बाद उन्हें शायद हम पर दया आ गई इसलिए मनुहार करते हुए बोलीं "अच्छा छोड़ो इन बातों को , आप तो आज बस एक अच्छी सी साड़ी दिलवा देना । मम्मी के घर जाना है ना । तो आज मैं वहां पर नई साड़ी ही पहन कर जाऊंगी" ? उनका आदेश मेरे लिए हमास के हमले जैसा ही था । सब कुछ तहस नहस होना तय हो गया था मेरा । पर उन्होंने कहा बड़ी अदा से, प्रेम से, मनुहार से । हमें पता था कि ये साड़ी लाख दो लाख से कम की पसंद नहीं करती हैं और इतना रुपया खर्च करने की इच्छा और हैसियत थी नहीं हमारी । हम अपने बचाव का रास्ता खोजने लगे । हमने कहा

"नहीं नहीं , साड़ी नहीं । कुछ और ले लो । मसलन , सूट , जींस टॉप वगैरह । पर साड़ी नहीं " हमें लगा कि इससे शायद हम बच जायेंगे । पर ऐसा होता है क्या ?

वो भी चौंकते हुए बोली "पर साड़ी क्यों नहीं" ?

"अरे यार , तुम्हारी एक साड़ी हमारा दो लाख का बिल बना जाती है । ना बाबा ना । कुछ और ले लो" । हमने गिड़गिड़ाते हुए कहा।

"मगर क्यों ? और साड़ी तो दो हजार में ही आ जाती है । आप दो लाख कैसे कह रहे हो " ?

मैंने समझाते हुए कहा "अरे भाग्यवान । साड़ी कभी अकेली कहां आती है ? अपने साथ अपनी पूरी मित्र मंडली जैसे ब्लाउज , पेटीकोट, लाइनर , फॉल , मैचिंग की बिंदी , लिपिस्टिक, नेकलेस सैट , चूड़ी , कंगन वगैरह के साथ धूमधाम से आती है । और नई साड़ी की किटी पार्टी भी तो होगी ना ? अब इन सबमें दो लाख का बिल तो बड़ी आसानी से बन ही जाएगा । क्यों है ना" ?

हमारी बात सुनकर उसने एक बार सोचने की मुद्रा में अपना मुंह बनाया । वैसे वो सोचने में कम और करने में ज्यादा विश्वास करती हैं । सोचने में कहीं मामला पलट ना जाये इसलिए वे तुरंत बोली " अच्छा एक काम करते हैं । ये सब सामान हम दो भागों में बांट देते हैं । एक भाग आपकी सैलरी से तो दूजा भाग मेरी सैलरी से ले आते हैं " ।

यह सुनकर हमारी तो बांछें खिल गई । चलो , अपना बजट आधा तो हुआ । मुझे यह प्रस्ताव बहुत पसंद आया और तुरंत हां कह दिया । अब उसने कहा " पहले चाय नाश्ता कर लो , फिर हम "नेकलेस सैट" लेने चलेंगे । वो और श्रंगार का सामान आप दिलवाओगे और उसके मैचिंग की साड़ी वगैरह मैं ले लूंगी "

अब हमें उसका षड्यंत्र समझ में आ गया । हमें देखकर वो खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी । क्या गुगली फेंकी थी उसने , हम तो सीधे क्लीन बोल्ड हो गये थे । मैं भी उसकी बुद्धि का लोहा मान गया । गजब की बुद्धिमान है वह । चारों खाने चित्त कर दिया था उसने । ऐसी पटकनी की उम्मीद तो हमने नहीं की थी । लेकिन, पत्नी से कौन जीत पाया है आज तक । वे ऐसा "नारायण अस्त्र" छोड़ती हैं जिसके सम्मुख लड़ना नहीं बल्कि समर्पण करना पड़ता है । हमारे पास भी समर्पण करने के अलावा और कोई काम बचा नहीं था । इसलिए पत्नी की शरण में जाना ही बुद्धिमानी का काम था । एक क्षण की भी देरी किये बिना हमने उन्हें साष्टांग दण्डवत करते हुए कहा " पत्नीम् शरणं गच्छामि" ।


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