मन का रंग
मन का रंग
"चलिए ना भाभी आज होली है रंगों से खेलते हैं।"
" नहीं रानू, मन नहीं कर रहा।"
"क्यों, क्या हुआ भाभी ?
"भला सफेद रंग से कोई होली खेलता है क्या रानू ?"
"अरे मेरे पास बहुत सारे रंग है - नीला, लाल, गुलाबी, पीला, हरा....बोलो कौन सा रंग पसंद है भाभी आपको? क्या सोच रही हो भाभी?"
"सोच रही हूं रानू, जब तुम्हारे भैया थे तो हर रंग रंगीन लगता था। पर जब वह इस दुनिया में नहीं है तो मन की आंखों से तो हर रंग मुझे सफेद ही दिखाई देता है। रंग केवल आंखों से ही नहीं देखा जाता रानू, मन से भी रंग दिखाई देता है।"
"हां भाभी, आप ठीक कहती हो यदि हमारा मन खुश है तो पूरी दुनिया खूबसूरत लगती है। आंखों से ज्यादा महत्वपूर्ण मन का रंग होता है लेकिन जीवन की खुशी के लिए मन का रंग बदलना भी जरूरी है भाभी।"
