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Ramashankar Yadav

Drama


4.5  

Ramashankar Yadav

Drama


मजदूर

मजदूर

3 mins 229 3 mins 229

मि. वर्मा शांती से एक कोने में टाट पर बैठे थे। जीवन में ऐसा वक्त भी आएगा कभी सोचा नहीं था। सारा रसूख,अकूत कमाई दौलत सब बेकार लग रहा था। मिं. खन्ना भी उनकी बगल में बैठे, गुस्से में तमतमाए कनअँखियों से उन्हे ही घूरे जा रहे थे मानों अब तक के सबसे प्रिय मित्र मि. वर्मा उनके सबसे बड़े शत्रु हो गए थे। दुसरी तरफ हाथ में भोजन की थाली लिए खड़ा मजदूर मंगलू ऐसे दीन नेत्रों से मि. वर्मा की तरफ ताक रहा था जैसे वही उसके भगवान हों और वो भोग लगा लेंगे तो उसे स्वर्ग-लोक प्राप्त हो जाएगा। 

उम्र के इस पड़ाव पर मि. वर्मा को बोध हुआ की विपरित परिस्थिती वो कुंड है जिसमें धुलकर मनुष्य अपनों की नजर में अपने वास्तविक मुल्य और मनुष्यता को करीब से पहचानता है, और यदि परिस्थिती बेहद प्रतिकुल हुई तो खुद को मनुष्यता के और करीब ले जाता है। असल में अंतर्मन से अतिप्रसन्न और संतुस्ट ईस कठोर परिस्थिती के लिए मि. वर्मा इश्वर को धन्यवाद दे रहे थे कि ऐसी वास्तविकता से उनका परिचय हुआ। 

बीते पल उनके स्मिर्ति पटल पर सिनेमा की तरह चल रहे थे। लगातार अपने मन में मि. खन्ना और मजदुर मंगलू की तुलना कर रहे थे । मि. खन्ना से वर्माजी की दोस्ती बीसों बरस की थी। एक साथ जाने कितने अच्छे पल बिताए थे , कितनी ही बार विलायत जाकर साथ में सारे मजे किए थे। चाहे विलायती शराब हो या विलायती मेम, दोनों ने साथ में चखे थे। आखिर मि. खन्ना ही तो उनकी जवानी के दिनों के हमराज थे।

फिर आज के दिन की याद ने बीती सारी यादों को पल भर मैला कर दिया। किस तरह मि. खन्ना ने सारी दोस्ती भुला कर बिना सोचे समझे सारा ठिकरा मि. वर्मा के सिर फोड़ दिया । जैसे उन्होने ही लाॅक-डाऊन कराया हो और मजदूरों की तरहआलू की बोरियाँ उनके कहने से मि. खन्ना को ढ़ोनी पड़ीं हों। ये तो संयोग था कि लाॅक-डाऊन की वजह से उनकी गाड़ी जप्त हो गई थी और उस पर दुर्भाग्य कि गाँव के लुटेरों के हत्थे चढ़े और मोबाईल बटुआ सब गँवा बैठे। ईसमें मि. खन्ना का क्या दोष। लाॅक-डाऊन में भी तफरी करने तो दोनों आपसी रजामंदी से निकले थे।

दूसरी तरफ मंगलू जैसे आठ माह पहले देखा था आज भी वैसे ही था। वही मैल से काली पड़ी बनियान, घुटने के नीचे तक निकरनुमा पायजामा और कंधे पर अँगोछा।

आठ माह में तो वर्माजी दो बार अपने शेक्षरू का पट्टा बदल चुके थे। उन्हे आज भी याद है, किस तरह उनकी ही फैट्री का मजदूर मंगलू, बिमार बच्चे के इलाज के लिए एक हजार रुपए अॅडवांस माँग रहा था। उसके गिड़गिड़ाने पर वर्माजी ने उस पर पाच सौ रुपए की दया दिखाई।

उस दिन के बाद मंगलू आज दिखा सब्जी मंडी में और तुरंत लपक कर उसने वर्माजी की बोरी अपने कंधे पर ले ली और वर्माजी की टूटती कमर को जीवन दान दे दिया।दिन भर अपने साथ-साथ वर्माजी के हिस्से की मजदूरी करने के बाद शाम को उसने वर्माजी को अपना परिचय दिया और दोनों को अपने साथ अपनी कुटिया में ले आया। तब तक तो वर्माजी यही समझते रहे कि उनकी रोज की पूजा से प्रसन्न स्वयं भगवान उनका बोझा ढो रहे हैं। 

आज स्वयं मजदूरी करके आधी पकी रोटी, आलू और टमाटर की सब्जी के साथ पेट भरके खाए और अघाए थे वर्माजी। बिना भात और गोस्त के खन्नाजी कभी तृप्त ना हुए थे, सो आज क्या होते। आज वर्माजी का छोटी कुटिया के मालिक के विशाल हृदय से परिचय हुआ था। आज मि.वर्मा को अहसास हुआ था कि वास्तव में एक मजदूर अपने मालिकों से कितना सुखी, संतुष्ट और हृदय से अमीर होता है।


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