मधुर स्मृति
मधुर स्मृति
बात सन 1991 की है । हर साल की तरह गर्मी की छुट्टियां बिताने हम लोग नानी के घर गए थे । हर दिन की भाँति दोपहर के भोजन के बाद घर के सभी बड़े लोग हल्की नींद लेने के लिए लेट चुके थे । बच्चों पर भी थोडा सो लेने का दबाव डाला गया पर हमें साल भर बाद बमुश्किल मिले अनमोल समय को सो कर बिता देना कोई बुध्दिमानी का निर्णय नहीं लगा । जैसे ही घर में बड़ों की आँख लगी, मैं और मेरे मामा जी के सुपुत्र, जो मुझसे कुछ महीने बड़े थे पीछे के बगीचे में जा पहुँचे । उन दिनों रामायण और महाभारत से प्रभावित बच्चों में तीर धनुष से खेलने का तीव्र आकर्षण हुआ करता था । मैं स्वयं भी ठीक ठाक निशाना लगा सकता था । स्वाभाविक रूप से आकर्षण का स्तर मेरे अंदर कुछ ज्यादा ही था ।
हम दोनों ने अपने अपने धनुष बाण लिए और लगभग दस फुट की दूरी से पौराणिक योद्धाओं की भाँती एक दूसरे पर आक्रमण करने लगे । कुछ देर तक पूरी श्रद्धा से बाण बरसाने पर भी कुछ ख़ास आनंद नहीं आ रहा था । योद्धाओं की रण पिपासा की तृप्ति के लिए रक्त स्राव आवश्यक था । हमारे फूल झाड़ू की सींक से बने हुए तीर यह करने में असमर्थ थे । समस्या विकट थी और निवारण के लिए पूर्ण मनोयोग की आवश्यकता थी । लगभग आधे घंटे की मंत्रणा के पश्चात रोमांच से लबरेज़ बाल मष्तिष्क ने उस विकट समस्या का विचित्र समाधान पा लिया ।
यह तय किया गया की हमारी नानी के सिलाई के बक्स में से चार पांच सुइयां चुपके से निकाली जाएं । तत्पश्चात उन सुइयों को फूल झाड़ू की सींकों पर ऐसे धंसा दिया जाए जिससे की सुई का नुकीला सीरा बाहर की ओर निकला रहे । ऐसा करके ब्रह्मास्त्र सरीखा एक ऐसा बाण तैयार होगा जो खून निकाल कर ही दम लेगा । घोर मंत्रणा के बाद उस नए आविष्कार की ख़ुशी से हम दोनों मन रोमांचित हो उठा । द्रुत गति से योजना को क्रियान्वित किया गया और हम दोनों ने तीन-तीन घातक अस्त्र आपस में बाँट लिए ।
लगभग तीन-साढ़े तीन का समय हो चुका था । सभी लोग सो चुके थे । हम लोग फिर से पीछे के बगीचे में आ गए । आम, केले और अमरुद के वृक्षों की छाया के कारण धूप लगने की कोई ख़ास समस्या नहीं थी । होती भी तो कोई फर्क न पड़ता क्योंकि बचपन में खेलने से रोका जाने से बड़ा कोई और कष्ट नहीं होता । खेलना हो तो सभी अड़चनें मार्ग से हट जाती हैं ।
दोनों योद्धा फिर से दस फ़ीट की दूरी पर खड़े हुए । चूंकि हम दोनों के पास केवल तीन-तीन तीर ही थे, यह सुनिश्चित करना आवश्यक था की कोई भी तीर व्यर्थ न जाए । अतः यह तय किया गया की हम दोनों एक साथ तीर नहीं चलाएंगे । पहले मैं तीर चलाऊँगा फिर भाई साहब उसका उत्तर देंगे । बड़े मन से मैंने उस घातक अस्त्र को प्रत्यंचा पर चढ़ाया और भाई साहब की ओर चला दिया ।
तीर उनकी हथेली पर लगा और तुरंत उनके मुँह से 'आह' की हल्की ध्वनि निकली । सुई का नुकीला सिरा उनकी कानी ऊँगली और तर्जनी के बीच से आर पार निकल गया था । तीर वहीं धंसा कर धीरे धीरे झूल रहा था । मैं तुरंत लपक कर उनके पास गया और घाव का अवलोकन करने के पश्चात आराम से तीर को बाहर निकाल दिया । आश्चर्यजनक रूप से तीर निकालते समय भाई साहब को अधिक दर्द का अनुभव नहीं हुआ, वह शांत चित्त थे। कारण साफ़ था । यह खेल हमने ही आरंभ किया था अतः किसी अन्य व्यक्ति को न तो दोष दिया जा सकता था न ही किसी के पास अपनी व्यथा का बखान किया जा सकता था । सामान्य जीवन में भी हम सभी यह देख सकते हैं की बच्चा जब अकेले में खेलते खेलते गिर जाए तो कई बार विलाप नहीं करता । ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय उसे पुचकारने वाला वहां कोई नहीं होता । व्यस्कों मनुष्यों पर भी यही नियम लागू होता है । मनुष्य बड़ी से बड़ी शारीरिक और मानसिक पीड़ा सह जाता है पर जब कोई स्वजन या अन्य प्रिय मित्र सहानुभूति दे अथवा प्रेम पूर्वक सहारा दे तो अश्रु धारा स्वतः ही अविरल बहने लगती है । उस समय इस गूढ़ मनोवैज्ञानिक तथ्य का ज्ञान न था परंतु यह पूर्णतः विदित था की सब कुछ चुप चाप ही करना है ।
तीर निकलते ही रक्त की एक पतली धारा बह निकली जिसे उन्होंने उसे अपनी ऊँगली से दबा कर और मुँह से चूस कर बंद कर दिया । पर बात यहीं ख़त्म होने वाली नहीं थी । भाई साहब ने मेरा वार सह लिया था और अब वार सहने की बारी मेरी थी । यद्यपि उनको और मुझे ज्ञात हो गया था की परिणाम क्या होगा, परंतु बदला लेने की एक छोटी सी भावना उनके मन में आ चुकी थी । मैं भी युद्ध के नियम का उल्लंघन नहीं करना चाहता था । उस अल्प आयु में भी इस बात का स्मरण था की अपनी बात से पीछे हटना वीर और स्वाभिमानी पुरुष के लिए मृत्यु के सामान होता है और मैं किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं कर सकता था । तीर का घाव कुछ समय के लिए कष्ट ज़रूर देता परंतु रणभूमि से पीठ दिखाकर भाग जाने का अपयश जीवन पर्यन्त भूत की तरह पीछा करता रहता ।
न भाई साहब ने कुछ कहा न मैंने । हम दोनों को ही पता था की क्या करना है । बिना अधिक सोच विचार किये मैं अपने स्थान पर खड़ा हो गया और वो अपना तीर धनुष ले कर मेरे सामने खड़े हो गए । उन्होंने तीर का मुख मेरी तरफ किया और उसे चला दिया । तीर तेज़ी से मेरी ओर आ रहा था । मेरा दायाँ हाथ स्वतः ही तीर को रोकने के लिए ऊपर उठा और आँखें बंद हो गयीं । मुझे अपनी हथेली पर तीव्र दर्द व् जलन महसूस हुआ । ध्यान से देखने पर पता चला की तीर का सिरा अंगूठे के नीचे से छेद करता हुआ दूसरी और निकल गया था । भैया की ही भाँती तीर धंस कर वही लटक गया था । यह देख कर वह मेरी और आये और हमने पहले की ही तरह तीर को निकाल दिया । आंसू का एक कतरा भी मेरी आँखों में न था । अपनी बात पर अडिग रहने का अजीब सा संतोष अवश्य था । भैया के मुखमंडल से भी यह साफ़ पता चलता था की बदला लेने का भाव जाता रहा था और अपने अनुज के सुरक्षा की भावना बलवती हो चली थी ।
पास ही एक नल था । हम दोनों ने सोचा की घावों से मिट्टी हटाने के लिए कम से कम साबुन से हाथ धो लिया जाए । नल से पानी निकला और मैं साबुन को हाथ पर मलने लगा । हाथ धोते धोते मैंने भैया की ओर देखा और उन्होंने मेरी ओर । एक तेज़ हँसी अनायास ही हम दोनों के मुख से फूट पड़ी । उस खिलखिलाहट के गर्भ में अपनी मूर्खता का बोध था । भीषण गर्मी की सुनसान दोपहरी में हम दोनों का अट्टहास बगीचे के सुप्त वातावरण को मनसायन करने लगा । फलस्वरूप हृदय में वार-प्रतिवार से उत्पन्न हुआ रोष भी अंकुरित होने से पहले ही समाप्त हो गया । उस घातक खेल का रहस्य दोनों बालकों की हँसी में सदा के लिए दब गया ।
इस घटना के इतने वर्ष बीत जाने पर भी उसकी स्मृति तनिक भी धूमिल नहीं हुई है । उन दिनों मोबाइल और इंटरनेट न हुआ करता था । टेलीविजन, वीडियो गेम और फ़ोन का भी बहुत कम ही चलन था । पर गर्मी की छुट्टियों की उन दोपहरियों में प्रियजनों के साथ विचित्र प्रकार के कौतुक करने का मज़ा कुछ और ही था ।
