Debabrata Mishra

Drama


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Debabrata Mishra

Drama


मां की यादें और अफसर बेटा

मां की यादें और अफसर बेटा

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गांव की बस आके अपने स्टॉप पे रुकी। एक शहरी बाबू हाथ में मेहेंगासा मोबाइल लिए किसी से बात करते हुए बस से उतरा और गांव के और कदम बढ़ाने लगा। तभी गांव के चौहराए पे बैठे हुए नाथा काका बोले तुम कैलाश के बेटे सुरेश हो ना जो अमेरिका में बड़ा अफसर है। वह सिर्फ हां बोला और आगे बढ़ने लगा। 

हां यह सुरेश है अमेरिका के Washington DC में एक बड़ी कंपनी कि CEO है। गांव के स्कूल में दसवीं कक्षा पास करने के बाद अपने मामा के घर सहर जाके इंटरमीडिएट पास करके आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके जाके अमेरिका में बस गया और आज १४ साल बाद गांव में लौटा है कारण Covid-१९ और सहर की बदलती मिजाज़।

घर में कदम देते ही उसके सामने उसकी बचपन के सारे दिन फिर से नाचने लगे। वह आंगन जहां वह दिन दिन भर खेलता रहता था, वह कुआं जिसके ठंडे पानी से नहके वह सुकून महसूस करता था , वह छत जहां गर्मी में वह रात रात भर जागकर चांद को देख के ना जाने कितने कल्पनाएं करता,वह tv जिसके सामने बैठके वह रामायण महाभारत और क्या क्या देखता था। वाह! वह भी क्या दिन थे ! उस के लिए एक पल में जैसे उसकी बचपन फिर से लौट आया और सारे पुराने दिन उसके सामने फिरसे ताज़ा हो गए।

वह तेजी से पहले रसोई के और कदम बढ़ाया की मां ने उस के खाने के लिए क्या क्या बनाया है ?

बचपन में गांव की तालाब की मछली को मसाला देके एकदम तीखी तरकारी उससे बहुत पसंद है। उसके साथ मा के हाथ की बनी पालांग और बड़ी की सब्जी भी बड़ी चाऊ से वह खाता है। और क्या क्या मां ने उस के लिए बनाया होगा यह सोच कर जैसे ही वह रोसेई में पहुंचा देखा वहां ना मां है ना ही उस के लिए कुछ खाना बना है। वह अपने आखों में बिस्वास नहीं कर पा रहा था कि इतने दिनों बाद वह घर को लौटा और मां ने उस के लिए कुछ भी नहीं बनाया यहां तक कि वह घर पे भी नहीं है।। वह गुस्से से लाल होके रसोई से निकल कर वरांडा में जाके बैठ गया और सोचा जब मां वापस आयेगी उनसे बिल्कुल बात नहीं करूंगा ऐसा भी कोई करता है इतने दिनों बाद बेटा घर को लौटा और उसकी कोई कदर ही नहीं है।

तभी उसके पिताजी खेत से आए और अपने इकलौते बेटे को इतने दिनो के बाद देखकर थोड़ा भावुक हो गए। जब उसका गुस्सैल मिजाज़ देखा तब उससे पूछा अरे बेटा घर आते ही इतना गुस्सा क्यूं है ? तब बेटे ने एक सांस में सारी सिकायते अपने पिताजी को बताया। पिताजी थोड़ी देर चुप रहें फिर बोले के बेटा! तेरी मां अब कभी वापस नहीं आयेगी १ साल पहले ही उसकी मौत एक अनजान बीमारी से हो चुकी है। उसकी आखिर इच्छा थी तुझे अपने हाथों से बनी रसोई खिलाये लेकिन तू तब इतना व्यस्त था कि एक पल हमसे बात भी नहीं करता और जब तेरी मां ने आखिर सांस ली तब मैंने तुझे फोन किया था लेकिन तूने कितना कुछ बोलके फोन रख दिया मेरी बात ही नहीं सुनी और मैंने भी तुझे दोबारा परेशान करना सही नहीं समझा।।

यह सुनते ही जैसे बेटे के पैरों तले जमीन खिशक गई वह सोच नही पाता था क्या करे क्या बोले।। तभी वह बिना कुछ बोले एक वार वापस रसोई में जाके वहीं चुला को देखा जहां एक दिन उसकी मां कई तरह की पकवान बनती थी जाके उस घड़े को देखा जिसमें पानी भर के मां रखती थी उस बेलन को देखा जिसमें मां रोटियां बनती थी उस छोटे से कटोरी को देखा जिसमें मां उससे बचपन में खिलाती थी।। यह सब देखके वह अपने आप को और संभाल नहीं पाया वही छोटे बच्चे की तरह बीलक के रोने लगा।।उसी बीच उसके पिताजी कब बाहर जाके कितने तरीके की नस्ता और मीठाई ले आए थे और अपने बेटे को परोसते हुए बोले ले बेटा सब कुछ भुला के कुछ खा ले बहुत दूर से आया है 

और बेटा बस यहीं सोचता रेहगाया 

"कहीं ज्यादा पढ़ाई करके और अपनी जिद से

बड़ों का अनादर करके बिदेश जाकर

खुद से तो दूर नहीं हो गया वह 

जिसकी कीमत उससे अपनी मा को खोके भरनी पड़ी ?"

इसी उलझन में रसोई की और देखते हुए , कास मां वहां आवाज़ देगी एक और रोटी खाले बेटा विदेश में रहकर कितना दुबला हो गया है

आखों से अंसुं टपकाते हुए सुरेश, वह विदेश से वापस आया हुआ अक्सर और उसकी मां की सिर्फ धुंधली होती यादें.......


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