जिंदगी के सपने
जिंदगी के सपने
खिड़की खुली थी, सरोजजी देख रहे थे खिड़की को झांक के, वो धूल मिट्टी भरे रास्ते, वो भीड़, जहां कोई किसी,को जानता नहीं था।
वो लड़कियां जो मॉडर्न कपड़े में हँस हँस कर किसी की गाड़ी के पीछे बैठ के उड़ गई। इतने में कलिंग बेल बजा दरवाजे पर थे निरंजन जी रिटायर्ड प्रोफेसर।
दोनो पुराने दोस्त है। बेठे चाए पीते पीते बोले निरंजन जी- जो भी कहिए अपना जमाना कुछ और था। सब के मुंह पर मुस्कुराहट थी सब गले लगाते थे। कोई बैर, कोई गुस्सा, कोई दुश्मनी नहीं थी।
गाड़ी नहीं था लेकिन नदी किनारे का प्यार कुछ अलग था। तुम्हारी भाभी और मैं कितने समय बिताते उस निर्झर के शब्द में वो ठंडे पवन में। प्यार में नहीं थी वासना सिर्फ एक पवित्र दिल। फिर शुरू हुई कहानी १९५८ की।
बोले पता है मैं बच्चा था। हमरे घर में बहत जमीन जायदाद थी। एक वारिस था मैं। पापा बोले आई ए एस होने के लिए, माँ बोली इतना पैसा कहां जाएंगे, तुम कुछ मत करो यही रहो। लेकिन में पढ़ाई के लिए बाहर आया। बचपन में गाँवों में रोका करवा दिया था घर वालों से संगीता के साथ। हम भी मिल लिये थे। मिलना हँसना उसके लिए गजरे लाना वो भी क्या दिन थे।
मैं बाहर गया पढ़ने लेकिन मोबाइल में ही था, भले पर चिठ्ठी था। ना था कोई पाप मन में ना था। धोखे देने का चिंता। में आई ए एस बन गया, शादी भी हो गई। पापा माँ को छोड़ कर बाहर जाना पड़ा। हर वक्त ये दुख था नहीं कर पाया कुछ घरवालों के लिए। अपनी करियर को ध्यान देने पर इन पर ध्यान नहीं दे पाया। पापा घर छोड़ कर नहीं आना चाहते थे।फिर समय गया जन्म हुआ मानस का हमारा बेटा। समय बीतता गया हम भी सांसारिक मोह में डूबते गए। बेटा को फौरेन भेजा पढ़ाई के लिए। लेकिन उसी वक्त आ गया तूफान। संगीता को कैंसर। बेटे को कॉल किया।
वहाँ से आवाज आती है एक लड़की का अंग्रेजी में बोलती है ही इज ठू बिजी नाउ बेटा बोलता है डार्लिंग इधर आ जाओ किसका कॉल होगा। मैं हल्का हँसा। मैने मैसेज कर दिया मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है लेकिन मैसेज नहीं आया वहां से।
मेरी संगीता दम तोड़ गई। खुश होकर की उसका बेटा अपना संसार वहां पर बना चुका है। माँ को आग देने के लिए बुलाना पड़ा बेटे को बेटा बहू आए। यहां को गर्मी बहू नहीं सह पाई। बोली डार्लिंग तुम्हारा इंडिया में कितना बेकार परंपरा है इतनी गर्मी कौन सहता है, ऐसी भी काम नहीं कर रही है। मुझे रेसस आ जाएंगे। बेटा बोला छोटा सा काम है करके चले जाएंगे।
छोटा सा काम ख़त्म करके चले गाए। आज में अकेला हूं कोई साथी नहीं है। सोचता हूं जिंदगी में क्या कमाया। आई ए एस हूं लेकिन खुश नहीं हूं। वो भी क्या दिन थे।
निरंजन जी बोले सुनिए सार आज आप यह है कल आपका बेटा यहां होगा। जिन्देगी की चार सीढ़ी होते हैं। बचपन जब हम कुछ नहीं जानते हैं, निस्वार्थ रहते हैं। जवानी जब हमें सब गुलाबी दिखता है सपने उड़ते हैं। पारिवारिक जब हमें अपने परिवार के अलावा कुछ नहीं दिखता है। और बुढ़ापा जब हम सोचते हैं हमने क्या कमाया है, क्या गँवाया है। आख़िर में हमें कुछ नहीं मिलता जिनके लिए हम जीते थे वो हमें छोड़ देते हैं, जो हमारे लिए जीते हैं उन्हें हम छोड़ देते हैं। कल को आपका बेटा यहीं पर अपने दोस्त के साथ यही कहानी सुना रहा होगा बस समय अलग होगी और किरदार अलग होंगे।
दो दोस्त हँस कर चले गये।
