इत्तिफाक
इत्तिफाक
रेशमा जब कालेज से निकली तब शाम होने बाली थी। ठंड के दिन थे और ठंडी हवा चल रही थी। आकाश में घने बादल छाए हुए थे। शायद वारिश भी हो। रेशमा ने ऊनी शाल अच्छे से लपेटा और औटो के लिए इधर-उधर नजरें घुमाई पर उसे कोई औटो नजर आया।
उसने पैदल ही घर जाने की सोंची और लम्बे लम्बे डग भरते हुए घर की ओर चल पडी। रास्ता करीब करीब सुनसान था। इक्का दुक्का लोग नजर आ रहे थे। रेशमा को एक भय का एहसास हुआ। उसने सर को झटका और तेज चलने लगी। अभी वह कुछ ही दूर गयी थी कि उसे पीछे मोटरसाइकिल की आवाज सुनायी दी। उसने पीछे मुडकर देखा, मोटरसाइकिल पर दो लडके बैठे थे। उसे कुछ अनिष्ट की आशंका हुयी। उसने अपने आपको इससे निपटने के लिए तैयार किया।
तभी मोटरसाइकिल एकदम पास आ गयी और पीछे बैठे लडके ने उसकी शाल खींच ली। रेशमा पहले तो एकदम घबड़ा गयी पर फिर अपने आपको सम्हाला और जोर से बोली, ' यह क्या बद्तमिजी है? मेरा शाल वापस करो'। दोनों लड़कों के चेहरों पर कुटिलता भरी मुस्कान आयी । एक ने हंसते हुए कहा, ' उसके लिए तुम्हे मेरे साथ आना होगा'। इसके पहले कि वह कुछ समझती, पीछे बैठे लडके ने उसे अपनी ओर खींच लिया और जबरन बाइक पर बैठा लिया।
बाइक तेजी से चलने लगी। रेशमा छटपटाने लगी । लडके ने दांए हाथ से उसका मुह बन्द कर रक्खा था। जब बाइक चौराहे के पास पहुंची तभी रेशमा ने मोटरसाइकिल पर एक लडके को देखा और जोर जोर से हाथ हिलाने लगी। वह मोटरसाइकिल तेजी से उनकी ओर बढी। कुछ ही देर मे फासला कम हो गया और उस अपरिचित ने अपनी मोटरसाइकिल सामने लगा दी। रेशमा ने उसे देखा। वह एक सुगठित शरीर बाला सुन्दर युवक था।
उसने जीन्स और टी शर्ट पहन रक्खी थी। रेशमा को कुछ उम्मीद की किरण दिखाई दी। वे दोनों इतनी आसानी से उसे जाने देने बाले नही थे। एक ने उसे पकड़ रक्खा था और दूसरा उस युवक से भिड़ पडा। जल्दी ही उस युवक ने उसे धराशायी कर दिया। उसे पकडे हुए लडके ने चाकू निकाल लिया और रेशमा के गले पर रख दिया। आगे बढते हुए वह युवक रुक गया। तभी रेशमा ने अपनी दाहिनी कोहनी लड़के के पेट मे दे मारी । वह आह कर झुक गया।
उसका ध्यान भंग होते ही युवक ने उसे दबोच लिया। उस युवक ने उन दोनो को पुलिस के हवाले कर दिया। युवक ने रेशमा को घर तक छोडने की पेशकश की। रेशमा पेशोपेश मे पड गयी। घर बाले और मोहल्ला बाले क्या सोचेंगे ? युवक ने उसके भाव को पढ लिया। उसने कहा, 'आप संकोच न करें। आईए'। रेशमा जब घर पहुंची तब अन्धेरा हो चुका था। देर भी काफी हो चुकी थी। रेशमा के घर बाले भी चिन्ता कर रहे थे। जब उन्होंने रेशमा को उस युवक के साथ देखा तो वे मुसकुराने लगे।
रेशमा तो डांट खाने की सोंच रही थी और उन्हे मुस्कुराते देख कर सोंच मे पड़ गयी। उन्होंने उस युवक को सम्मान से बुलाया और घर में बैठाया। अब्बा ने रेशमा का चेहरा देखा और हंसने लगे। ' अरे पगली, यह अपने चचा जान का बेटा हसन है। इसके साथ ही तुम्हारे निकाह की बात चल रही है'। रेशमा के चेहरे पर शम॔ की लाली छा गयी। उसने हसन को देखा जो उसी की तरफ देख रहा था। रेशमा शरमा कर घर के अन्दर चली गयी।
