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Pramod Bhandari

Drama Classics Inspirational

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Pramod Bhandari

Drama Classics Inspirational

हस्ताक्षर

हस्ताक्षर

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नगर निगम के कार्यालय में आज भीड़ कुछ अधिक थी।

एक दुबली-पतली वृद्धा अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। हाथ में एक पुरानी फाइल थी, जिसके कोने घिस चुके थे।

काउंटर पर बैठे कर्मचारी ने पूछा, "क्या काम है?"

"पेंशन के कागज़ जमा करने हैं बेटा।"

कर्मचारी ने फाइल देखी और एक फ़ॉर्म आगे बढ़ा दिया।

"यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।"

वृद्धा चुप खड़ी रही।

"क्या हुआ?"

"हस्ताक्षर करना नहीं आता।"

"तो अंगूठा लगा दीजिए।"

वृद्धा ने स्याही में अंगूठा डुबोया और निशान लगा दिया。

पास बैठा युवक मुस्कुरा दिया। शायद उसे वह अंगूठा अशिक्षा का प्रतीक लगा था।

कर्मचारी ने औपचारिकता में पूछा, "माता जी, कभी स्कूल नहीं गईं?"

"गई थी बेटा... पर दूसरे रूप में।"

सबकी उत्सुकता बढ़ गई।

वृद्धा ने धीरे से कहा, "जब मेरे पति का देहांत हुआ, तब मेरा बेटा पाँच साल का था और बेटी तीन साल की। घर चलाने के लिए लोगों के खेतों में मजदूरी की। कभी ईंटें ढोईं, कभी सड़क बनाई।"

वह क्षणभर रुकी।

"बेटा डॉक्टर बनना चाहता था। बेटी अध्यापिका। दोनों की फीस भरने के लिए मैंने अपना नाम लिखना सीखने का समय भी बेच दिया।"

कार्यालय में सन्नाटा उतर आया।

वृद्धा ने आगे कहा, "आज बेटा बड़े अस्पताल में डॉक्टर है। बेटी स्कूल की प्रधानाचार्या है। दोनों अपने-अपने नाम के आगे इतने बड़े हस्ताक्षर करते हैं कि पूरा पन्ना भर जाता है।"

उसने अपने अंगूठे के निशान को देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोली—

"मैंने सोचा, चलो अच्छा है। मेरे हिस्से का हस्ताक्षर तो उनके नामों में पहले ही हो चुका है।"

कर्मचारी का सिर झुक गया。

उसने फ़ॉर्म संभालकर रखा, मानो वह कोई सरकारी कागज़ नहीं, जीवन का प्रमाण-पत्र हो।

वृद्धा बाहर चली गई।

फ़ॉर्म पर बना वह छोटा-सा अंगूठा आज वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के बड़े-बड़े हस्ताक्षरों से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा था।


Copyright © 2026 प्रमोद भंडारी 'पार्थ' 


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