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Shristi singh

Drama Romance Others

4  

Shristi singh

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हीर और रांझा

हीर और रांझा

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पाकिस्तान के चेनाब नदी के किनारे पर अख्तर हजार नाम का गांव था, जहां पर रांझा जनजाति के लोग रहते थे। मुझू चौधरी गांव का मुख्य जमींदार था। उसके चार पुत्र थे। रांझा सभी भाइयों में सबसे छोटा था। रांझा का असली नाम मियां उमर था, लेकिन सब उसे रांझा कहकर बुलाते थे। रांझा अपने भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण अपने पिता का बहुत लाडला था।


वह बहुत अच्छा बांसुरी बजाता था। उसके भाइयों में जमीन के विवाद के कारण उसने अपना घर छोड़ दिया था।

एक रात रांझा ने मस्जिद में आसरा लिया और सोने से पहले समय व्यतीत करने के लिए मस्जिद में बांसुरी बजाने लगा। वहां के मौलवी साहब ने बांसुरी की आवाज सुनी तो उसे बांसुरी बजाने से मना किया और जब रांझा ने उससे कारण पूछा तो मौलवी साहब ने बताया कि बांसुरी का संगीत इस्लामी नहीं है और यह संगीत मस्जिद में बजाना वर्जित है। फिर उसने बांसुरी रख दी।

और सुबह होने के बाद वह मस्जिद से निकलकर दूसरे गांव पहुंचा, जो कि हीर का गांव था। सियाल जनजाति के संपन्न जाट परिवार में एक सुंदर युवती थी, जिसका नाम हीर था।

हीर के पिता ने रांझा को मवेशी चराने का काम सौंपा था, और जब वह अपना काम पूरा कर लेता तो उसी खेत में बांसुरी बजाने लगता था। एक दिन उसकी बांसुरी की आवाज पर हीर मंत्रमुग्ध हो जाती थी और जहां रहती, वहां उसकी धुन में मगन हो जाती थी। और धीरे-धीरे हीर को रांझा से प्यार हो गया। वे एक-दूसरे से बहुत प्यार करने लगे थे, और एक-दूसरे से छुप-छुपकर अलग-अलग जगहों पर मिलते थे। कई सालों तक यह सिलसिला चलता रहा और एक दिन हीर के चाचा कैदू ने ईद को रांझा के साथ देख लिया और सारी बात हीर के पिता और मां मालती को बता दिया।

तब हीर के घरवालों ने रांझा को नौकरी से निकाल दिया, दोनों को मिलने से मना कर दिया गया। उनके पिता ने उसकी शादी कैदो खेड़ा नाम के व्यक्ति के साथ करने के लिए कहा। मौलवियों और अपने परिवार के दबाव में आकर उसने हार से निगाह कर लिया।
जब इस बात की खबर रांझा को मिली तो उसका दिल टूट गया। वह ग्रामीण इलाकों में दर-दर भटकता रहा। एक दिन उसे एक जोगी गोरखनाथ मिला।
गोरखनाथ संप्रदाय के कानफटा समुदाय से था और उसके साथ में रहकर रांझा भी जोगी बन गया। उसने भी कानफटा समुदाय का पालन करते हुए अपने कान से डालिए और भौतिक संसार का त्याग किया। रब का नाम लेते हुए वह पूरे पंजाब में भटकता रहा। अंत में उसे हीर का गांव मिला, जहां हीर रहती थी।

वह हीर के पति सैदा के घर गया और उसका दरवाजा खटखटाया। सैदा की बहन सहती ने दरवाजा खोला। सहती ने हीर के प्यार के बारे में पहले ही सुन रखा था। सहती अपने भाई की शादी के विरुद्ध थी। उसने अपने भाई की गलती को सुधारने के लिए हीर और रांझा के साथ भागने में मदद की।

हीर और रांझा वहां से भाग गए, लेकिन उनको राजा ने पकड़ लिया। राजा ने उनकी पूरी कहानी सुनी और मामले को सुलझाने के लिए काजी के पास ले गए। हीर ने अपने प्यार की परीक्षा देने के लिए आग पर हाथ रखकर कहा कि वह रांझा से बहुत प्यार करती है। राजा उनके असीम प्रेम को देखकर समझ गए और उन दोनों को छोड़ दिया।
वहां से वे हीर के गांव गए, जहां उसके माता-पिता निगाह के लिए राजी हो गए थे। निगाह के लिए वे दोनों बहुत खुश थे क्योंकि उनका प्यार सफल होने जा रहा था।

लेकिन उसी दिन हीर के चाचा कैदू ने उसके खीर में जहर मिला दिया ताकि यह शादी रुक जाए।

यह सूचना जैसे ही रांझा को मिली, वह दौड़ता हुआ हीर के पास पहुंचा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। हीर ने वह खाना खा लिया था जिसमें जहर था और उसकी मौत हो गई। रांझा हीर की मौत के दुख को सहन नहीं कर पाया और उसने जहर वाला खाना खा लिया। जहर के कारण उसकी भी मौत हो गई।


हीर और रांझा को उनके पैतृक गांव में दफन किया गया। ऐसा माना जाता है कि हीर और रांझा की मौत का सुखद अंत था।

आज भी लोग उनकी कहानी सुनकर भगवान से ऐसे प्रेमी की दुआ मांगते हैं।


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