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Gitanjali Varshney

Drama Inspirational


4.6  

Gitanjali Varshney

Drama Inspirational


"एक रिश्ता प्यारा सा

"एक रिश्ता प्यारा सा

6 mins 391 6 mins 391

"एक सामाजिक जीवन अनेकों रिश्तों में बंधा होता है, कुछ रिश्ते रक्त संबंधी होते है तो कुछ दिल से जुड़े होते है, ऐसा ही एक रिश्ता है दर्द का, जो अनजाने ही जुड़ जाता है।"


मीता मध्यम वर्गीय लड़की है। बड़े ही लाड़-प्यार में पली। अपने माँ-बाप की इकलौती बेटी। मन पसंद खाना, मन पसंद पहनना, एकदम मस्तमौला।


पापा मीता को वकील बनाना चाहते हैं। कहते है, "मीता की माँ देखो मीता कैसे बहस करती है, बिल्कुल एक मंझे हुए वकील की तरह।"


माँ कहती, "बिगाड़ दो लड़की को, बस बहस करना ही सीखाना।"


मिश्रीलाल (मीता के पिता) मुस्कुरा कर रह जाते।


धीरे धीरे मीता ने एल.एल.बी. फिर वकालत पास की फिर प्रोन्नत होकर जज बनकर जालंधर में पोस्टिंग हो गयी। माँ-पापा को भी मीता साथ ले जाना चाहती थी। किन्तु मिश्रीलाल की नौकरी को अभी 7 साल बाकी थे।


वास्तव में मीता, मिश्रीलाल की अपनी बेटी नहीं थी, उनका अपना कोई बच्चा भी नही था। अभी मिश्रीलाल की शादी को 2 साल ही हुए थे, अपनी शादी की सालगिरह पर दोनों दंपति अनाथ बच्चों को खाना खिलाने अनाथ आश्रम गए, बड़े प्यार से उन्होंने बच्चों को खाना खिलाया और जैसे ही चलने को हुए, एक एक साल की बच्ची ने सावित्री (मिश्रीलाल की पत्नी) का दामन पकड़ लिया और प्यारी सी आवाज में उसके मुँह से निकला, "माँ।"


सावित्री ने देखा, बच्ची बड़ी मासूमियत से मुस्करा रही थी। आँखों में अपनत्व, ऐसा लगा मानो कह रही हो, माँ मुझे भी ले चलो।


सावित्री कुछ पल रुकी फिर मिश्रीलाल की तरफ देखा, उन्होनें भी मूक सहमति दे दी। और वे दोनों मीता को लेकर घर आ गए। मीता के लिए प्रेम कम न हो दोनों ने अपना बच्चा न करने का फैसला लिया। लेकिन दोनों ने कभी मीता को यह एहसास न होने दिया कि, उसे अनाथ आश्रम से गोद लिया गया है, न ही कभी बताया।


मीता के साथ एक प्यारा सा रिश्ता बन चुका था, दर्द के साथ साथ ममता का।


अब आगे...


अब मिश्रीलाल को मीता के विवाह की चिंता होने लगी। वे सोचते मेरे रिटायर होने से पहले मीता का विवाह हो जाये, उन्होंने मीता को बुलाया और पूछा, "बेटा अब अकेले कब तक रहोगी, शादी कर लो।"


मीता बोली, "पापा आप चिंता न करो मैंने लड़का देख लिया है।"


फिर क्या था मिश्रीलाल ने मीता से पूँछ कर तुरंत लड़के वालों को संदेशा भिजवाया और मिलने की तारीख पक्की की।

मिलने का दिन 25 मार्च रखा गया। मिश्रीलाल और सावित्री सुबह की ट्रेन से जालंधर पहुंच गए। स्टेशन पर विनोद (लड़का) खुद लेने पहुँच गया।


चारो और हरियाली, सुंदर तोरण से द्वार सजा था, शांत और स्वच्छ बिल्कुल फूल बंगला लग रहा था।


अंदर प्रवेश करते करते सावित्री का मन घबराने लगा। चारों और नौकर-चाकर, नाश्ते में हर तरह के पकवान, लाल अंगूर, कचोरी, चटनी, देशी से लेकर विदेशी तक हर तरह के पकवान, मन देखकर ऊपर को आने लगा।


सावित्री मन ही मन सोचने लगी कितना शानदार बंगला, कितना पैसा, पिता की चार ग्लास फैक्ट्री, बेटा मीता के साथ सहायक जज, कैसे बेटी सामंजस्य करेगी और फिर यदि पता लग गया कि मीता अनाथ है फिर क्या होगा?


विनोद की माँ जो खुद किसी विद्यालय में प्रिंसिपल थी, बहुत ही सुलझे विचारों वाली महिला।


सावित्री ने इशारे से मिश्रीलाल से कुछ कहा और दोनों उठकर बाहर चले गए, सावित्री बोली, "हमें सब बता देना चाहिये।"


मिश्रीलाल बोले, "ठीक है।"


तभी जया (विनोद की माँ) आ गयी, दोनों अचंभित से एक दूसरे को देखने लगीं, लेकिन कुछ कहने की हिम्मत न जुटा पायी सावित्री।


सब अंदर आ गए, चारों तरफ सन्नाटा, कुछ देर के लिए जैसे सबने मौन धारण कर लिया हो।


अंततः जानकी प्रसाद (लड़के के पिता) ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, "फिर क्या सोचा आपने जज।"


मिश्रीलाल बोले, "जी जैसा आप उचित समझें।"


"तो ठीक है 7 अप्रैल को सगाई की तारीख पक्की।"


"जी..." कहकर दोनों वापस लुधियाना आ गए।


आज 7 अप्रैल थी... मीता और विनोद दोनों ही खुश अपनी सगाई की तैयारी में लगे हुए थे। चारों और चहल पहल, लाइटें चमचमा रही थीं। मेहमान आ चुके थे।


सगाई की घड़ी आ गयी, अब भी सावित्री की हिम्मत न हो पाई सत्य बताने की, सगाई की रस्म भी हो गयी। अगले महीने शादी की तारीख भी पक्की हो गयी। सावित्री कुछ न कह पायी।


शादी होकर मीता ससुराल आ गयी। जया मीता को बहुत प्यार करती उसकी हर जरूरत का ध्यान रखतीं, विनोद तो जैसे जान ही लुटाता था। धीरे धीरे एक साल बीत गया।


अचानक मीता को उलटियां शुरू हो गयी, सभी बहुत खुश थे नन्हा मेहमान जो घर आने वाला था।


मीता के माँ बनने की सूचना सावित्री और मिश्रीलाल को भी दी गयी।


वे दोनों मीता से मिलने जालंधर पहुँच गए। बातों ही बातों में पता लगा मीता की सास जया भी लुधियाना से हैं, फिर तो बातों का सिलसिला यूँ चल पड़ा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।


मिश्रीलाल ने वापस लौटकर पूरे शहर में मिठाई बटवाई।


धीरे धीरे आठ माह बीत गए पता ही न चला। एक दिन मीता सुबह सुबह उठकर नीचे आ रही थी कि सीढ़ियों से पैर फिसला और मीता फर्श पर आ गिरी। अचानक मीता के गिर जाने से खुशियों पर जैसे ग्रहण लग गया। तुरंत एम्बुलेन्स आ गयी, उधर मिश्रीलाल को खबर मिली तो वे दौड़े चले आये। अधिक रक्त बह जाने के कारण मीता बेहोश थी, तुरंत खून की आवश्यकता थी, माँ-बाप का किसी का भी खून मीता से मैच नहीं किया।


जया बोली, "ऐसा कैसे हो सकता है... आप दोनों का खून क्यों नहीं मिला..."


तब सावित्री ने पूरी कहानी सुनाई। अब जया अचंभित थी, उन्होने पूंछा, "कौन से अनाथालय से..."


तब फिर एक बार पूरी कहानी फ्लेशबैक में चली गयी।


वास्तव में जब जया कॉलेज में पढती थी तो उसके रिश्ते के चाचा ने उसके साथ जबरदस्ती की थी। उसके फलस्वरूप जया गर्भवती हो गयी। परिवार की इज्जत की खातिर बात को दबा दिया गया। शहर से दूर जया ने एक बेटी को जन्म दिया और उसी अनाथ आश्रम में छोड़ दिया जहाँ से सावित्री और मिश्रीलाल मीता को लाये थे।


जया का खून मीता के खून से मिल गया था। लेकिन मीता सारी कहानी से बेखबर थी, उसने भी एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया था।


अब जया बैचेन रहती। अगले महीने मीता की शादी की साल गिरह थी, सभी ने उसी अनाथाश्रम में जाकर बच्चों को मिठाई कपड़ें बांटने का निर्णय लिया।


जया की बैचेनी और बढ़ गयी।


सभी अनाथ आश्रम पहुँचे। सभी मिठाई, कपड़े बांटने लगे थे, मौका देखते ही जया संचालिका के पास पहुँची, जानकारी लेने पर पता चला, मीता तो वही बच्ची है।


उसके होश उड़ गए, अब क्या हो सकता था... उसने बात को छिपाए रखना ही उचित समझा।


आज जया को मीता पर ज्यादा ही प्यार आ रहा था... उन्होनें मीता को पास बुलाया और बोली, "मीता मैं तुम्हारी माँ तो न हो पाऊँगी... क्योंकि जो दर्द तुम्हारी माँ ने तुम्हारे साथ जिया है, शायद मैं उसे कभी समझ भी न पाऊँगी। हाँ आज मेरा रक्त भी तुम्हारी धमनियों में दौड़ रहा है... तो तुम मेरी बेटी से भी ऊपर हो गयी हो।"


मीता कुछ समझ न पा रही थी, बस एकटक जया की तरफ देखे जा रही थी। जया भी सोच रही थी, क्या नाम दे अब इस रिश्ते को, सासू माँ या माँ। एक अनोखा प्यारा सा रिश्ता जो पनप रहा था जया और मीता के बीच।


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