दो कमरे
दो कमरे
सुबह सीढियों में जूते पहनते हुए पापा खुशी से चिल्ला रहे थे आज लाडो के चाचा जी आयेंगे। खुशी होती भी क्यों नहीं कुछ ही दिन पहले तो हमारे फोटो को देखकर उनका संदेश आया था कि हमें लाडो की याद आती है। पापा का पुरा दिन दफ्तर में खुशी से और मेरा इंतजार में गुजर गया। शाम को सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पापा चिल्ला रहे थे आज लाडो से मिलने कौन आया था ? अंदर आते ही गोद में लेकर छत तक उछाल उछाल कर कह रहे थे अले आज तो नटु चाचा से मिला था। क्या क्या लाये लाडो के चाचा नटु के लिए ?
तभी रसोई से आवाज आई वो गांव चले गये दिन में ही। पापा धीमें से बोले कोई ना घर पर काम था यहाँ आता तो एक घंटे खराब हो जाता। और फिर गांव में मां भी तो है। लाडो से तो फिर कभी मिल लेगा।
नटु रो रहा है आप ऐसे करो इसको दूध पिलाओ में हाथ मुंह धोकर आता हुँ फिर खाना खायेंगे भूख लग रही है। ये बोलते हुए पापा मुझे नीचे बैठाकर बाथरूम में चले गये। बाथरूम में बैठकर पापा सोच रहे थे कि याद आने वाला संदेश झूठा था या मेरे से गलती हो गई जो दिन में जब फोन आया था तब उसको यहाँ आने के लिए नहीं बोला। मां मुझे दूध पिला ही रही थी कि बाथरूम से रुंधे हुए गले से आवाज आई यार नटु मम्मी हमने ये दो कमरे लेकर गलती कर दी। इन दो कमरों ने अपनी होली-दिवाली, घर-परिवार, और भाई-रिश्तेदार सब छीन लिए और आज तो इन्होंने शायद वो भी जो बचपन में मेरे बिना शु शु करने तक नहीं जाता था।
तभी रसोई से आवाज आई नटु सो गया और खाना ठंडा हो रहा है आप बाहर आ रहे हो या मैं खाना बाथरूम में ले आऊं और बाथरूम से रुंधे हुए गले से सिर्फ एक ही आवाज आई- आया।
