धानी धरती
धानी धरती
'बाल-विचार-मंच' के बच्चों की भीड़ पूरी तैयारी में थी। सभी बच्चे प्रसन्न और उत्साहित थे। पिछले पाँच दिनों से वे अपनी सोसाइटी की सफ़ाई करने में जुटे थे। जगह-जगह से कूड़ा उठा दिया था, जंगली घास, झाड़-फूँस उखाड़ फेंका था और बदरंग हुए गेट को रंग दिया गया था। गेट के साथ लगी छोटी लंबी दीवार पर भी
कुछ बड़े बच्चों ने अपनी कलाकारी दिखा दी। आज वृक्षारोपण अभियान' करना था। सभी के पास कोई न कोई औजार था। आज उन्हें नीम के तीम लगाने थे और उनकी सुरक्षा के लिए उनके चारों ओर चार छह ईंट भी लगानी थे के गड्ढे खोदने की जिम्मेदारी अंकुर, गौरव, आनंद, राजेश और अधर ने संभ शालू, प्रीति, वंदना और प्रियंका को पौधा लग जाने के बाद गड्ढे में मिट्टी और पानी देने का काम सौंपा गया। बाकी बच्चों को पानी ढोने और ईंटें खोज लाने के कार्य पर लगाया गया।
"मैं तो यह सोच रहा हूँ कि वर्षों बाद जब ये पौधे वृक्ष बन जाएंगे तो मुहल्ले में कितनी हरियाली होगी। हमारे वृक्ष बादलों को वर्षा करने का नि देंगे और बादल... जानते हो कैसे दौड़े आएंगे! एक-दूसरे को धकेलते हुए। बादल कहेगा- पहले मैं! काला बादल उसे फटकारेगा-चल भूर्त वहाँ तेरा काम? जा पहले जल भरकर ला। पहले जलधर बन।" मनोज जैसे किसी स्वप्न खो गया था।
"अरे! यह क्या हो रहा है?" अचानक किसी कठोर स्वर ने उनकी बातचीत विघ्न डाला। यह चोपड़ा अंकल की आवाज थी, जिनके घर के सामने वाले कच्ची पटरी पर वे गड्ढा खोद रहे थे।
अंकल, हम पौधे लगा रहे हैं। गौरव ने पसीना पोंछते हुए उत्तर दिया। मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। बस तुम मेरे घर के सामने पौधे नहीं लगाओगे।-चोपड़ा अंकल भड़के।
क्या हुआ चोपड़ा साहब? बच्चों को क्या समझा रहे हैं?-तभी गुप्ता अंकल भी वहाँ आ पहुँचे।
अब देखिए न, मेरे घर के सामने नीम के पौधे लगा रहे हैं। जब ये पौधे पेड़ बनेंगे तो मेरे घर की नींव हिला देंगे।-चोपड़ा अंकल बोले।
चोपड़ा साहब, ये तो आपके घर से आठ फुट दूर पौधे लगा रहे हैं। नीम की जड़ें इतनी विकराल नहीं होतीं, जितनी बरगद या पीपल के पेड़ की होती हैं। फिर आप यह भी तो सोचिए कि जब ये पौधे पेड़ बनेंगे तो आपके घर में बीमारियों को घुसने से रोकेंगे। आपको ताज़ी, स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक प्राण वायु मिलेगी, दातुन और निबौरी की तो मौज रहेगी। गरमियों में लू का प्रकोप न होगा।-गुप्ता अंकल ने हँसते हुए समझाया।
लेकिन चोर-उचक्कों का तो प्रकोप होगा न।-चोपड़ा साहब आँखें तरेरते हुए बोले, "जब गरमियाँ आएँगी तो इस मुख्य सड़क पर चलने वाले सभी खोमचे, रिक्शे-ठेले वाले इसकी छाया में आराम फरमाएँगे। फल-सब्ज़ी वाले आते-जाते
सड़ी-गली चीज़ें फेंक जाएंगे। इसकी पत्तियों से जो कूड़ा-करकट जमा होगा, अलग। ना बाबा, ना!"
यह भीड़ क्यों लगी हुई है?-श्रीमती चोपड़ा ने फाटक वाले ढलान से उतरते हुए पूछा। बच्चों ने सारी बातें श्रीमती चोपड़ा को बताई।
सारी बातें सुनने के बाद श्रीमती चोपड़ा ने बच्चों का पक्ष लिया और चोपड़ अंकल पर नाराज़ हुईं। उन्होंने बच्चों को आश्वस्त भी किया- इस पौधे की सेव और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मैं उठाती हूँ। श्रीमती चोपड़ा की यह बात सुनते ही सा वातावरण तालियों से गूंज उठा। चोपड़ा अंकल को भी अपनी गलती का एहसास हो गया।
