एक बौना और लकड़हारा
एक बौना और लकड़हारा
एक लकड़हारा था। वह जंगल में जाकर रोज़ लकड़ियाँ काटता था और शहर लाकर उन्हें बेच देता था। एक दिन उसने सोचा-आस-पास से तो सब लकड़हारे लकड़ी काटकर ले जाते हैं। सूखी लकड़ी आसानी से मिलती नहीं, इसलिए जंगल के अंदर दूर तक जाना चाहिए।
एक दिन वह जंगल में बहुत दूर तक निकल गया। सरदी का मौसम था। सख्त जाड़ा पड़ रहा था। हाथ-पाँव ठिठुर रहे थे। उसकी उँगलियाँ बिलकुल सुन्न हुई जाती थीं, इसलिए वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुल्हाड़ी रख देता। फिर दोनों हथेलियाँ मुँह के पास ले जाकर खूब ज़ोर से फूँक मारता, जिससे वे गरम हो जाएँ।
दूर से एक बौना उसे देख रहा था। उसे बार-बार फूँक मारते देखकर बौना सोच में पड़ गया। जब उसकी समझ में कुछ न आया, तो वह ठुमक ठुमककर लकड़हारे के पास गया। उसने कहा- "भैया जी, एक बात पूछूं ?"लकड़हारा बौने को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। उसे हँसी आने को थी, पर उसने हँसी रोककर कहा- हाँ, पूछो।
"तुम हाथों में फूँक क्यों मारते हो?"
लकड़हारे ने जवाब दिया सरदी बहुत है। हाथ ठिठुर जाते हैं। मैं मुँह से फूँककर उन्हें गरमा लेता हूँ।•बौने ने अपना सुपारी जैसा सिर हिलाया और कहा अच्छा, यह बात है। यह कहकर वह वहाँ से चला गया, पर रहा आस-पास हो । दूर से ही लकड़हारे की हरकतें देखता रहा।
दुपहर हुई, तो लकड़हारे ने खाना पकाने की तैयारी की। इधर-उधर से दो पत्थर उठाकर उसने चूल्हा बनाया। उसके पास हाडी थो आग सुलगाकर उसे चूल्हे पर रखा। उसमें आलू उबलने के लिए रख दिए। लकड़ी गीली थी. इसलिए आग बार-बार ठंडी हो जाती थी। लकड़हारा मुँह से फूँककर उसे तेज़ करता था। बौने नेसोचा- अब यह फिर फूंकता है। क्यामुँह से आग निकलती है? पर वहचुपचाप देखता रहा।
लकड़हारे को बहुत भूख लगी थी, इसलिए उसने आलू निकाल लिया। आलू काफ़ी गरम था। उसने उसे खाना चाहा, इसलिए वह उसे फूंक मारकर ठंडा करने लगा।
उसे ऐसा करते देखकर बौने को फिर आश्चर्य हुआ। उसने सोचा अब यह फूँक क्यों मारता है? अब क्या आलू को फूँककर जलाएगा? पर आलू जला नहीं। लकड़हारे ने फूँक मार-मारकर उसे ठंडा कर लिया और 'गप-गप' करके खाने लगा। बौने को बहुत आश्चर्य हुआ। उससे रहा न गया। वह फिर ठुमक ठुमककर लकड़हारे के पास पहुँचा। उसने कहा- "भैया जी बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?" लकड़हारे ने कहा-"बुरा क्यों मानूँगा?"
बौने ने कहा- "सुबह आपने कहा था कि मुँह से फूँक-फूँककर अपने हाथों को गरमाता हूँ। अब आलू को क्यों फूँकते थे? यह तो खुद गरम था। इसे और गरमाने से क्या लाभ?"
"नहीं, यह आलू बहुत गरम था। मैं इसे मुँह से फूँक-फूँककर ठंडा कर रहा था।" यह सुनकर बौने का मुँह पीला पड़ गया।
लकड़हारे ने पूछा-"क्यों भाई, क्या हुआ?"
पर बौना पीछे हटता गया। काफ़ी दूर जाकर बोला- "यह न जाने क्या बला है। कोई भूत नहीं आती। है या प्रेत है! उसी से ठंडा, उसी से गरम!"
