देबू का गुस्सा
देबू का गुस्सा
देबाशीष और शुभाशीष दो भाई थे। प्यार से सभी देबाशीष को देबू तथा शुभाशीष को शुभो कहकर बुलाते थे। उनका परिवार कोलकाता में बसा हुआ था। जहाँ देबू दस साल का था और पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था, वहीं शुभो केवल चार साल का में था और अभी-अभी नर्सरी में दाखिल हुआ था। सभी छोटे बच्चों की तरह शुभो भी स्कूल जाने में आनाकानी करता था।
आज नौ बज गए थे, पर शुभो अभी तक बॉल से खेल रहा था। माँ ने उसे दो बार नहलाने की कोशिश की, पर वह बार-बार बच निकलता। माँ ने उसके कान खींचे और ज़बरदस्ती स्नानघर की ओर ले चलीं। देबू पास में ही खड़ा था। छोटे भाई को डाँट खाते देखकर आज उसे कुछ-कुछ मज़ा-स आ रहा था।
दरअसल छोटा होने के कारण माँ का अधिकतर समय शुभो को सँभालने में लग जाता और वह देबू की तरफ़ ज्यादा ध्यान नहीं दे पाती थीं। इससे देबू को लगता, माँ उसे अब प्यार नहीं करतीं। देबू को अपना भाई एक खिलौने की तरह लगता। ऐसा जीता-जागता गुड्डा, जो हाथ लगाते ही हँसने या रोने लगता था। | हँसा तो कोई बात नहीं, पर जैसे ही यह गुड्डा रोता, माँ समझतीं, उसने मारा है। | फिर देबू को वह डाँट पड़ती कि बस...! इसीलिए आज माँ के दुलारे को डाँट खाते देख उसे खुशी मिल रही थी। उसे यह प सोचकर मज़ा आ रहा था-बच्चू, खूब उछलते-कूदते रहते थे। अब रोज़ स्कूल जाओगे तो पता चलेगा, भैया मज़े नहीं उड़ाते, जान लड़ाते हैं पढ़ाई में। शुभो को आँ-आँ करते और पानी की धार से बचते देख देबू ने ताली बजानी शुरू कर दी। शुभो को सँभालने में माँ को काफ़ी मेहनत करनी पड़ रही थी। बड़े लड़के को हँसते देख उनका धीरज टूट गया। शुभो के बदन पर तौलिया डालकर उन्होंने देबू को झिंझोड़ दिया- शर्म नहीं आती! मदद नहीं कर सकते, तो तंग तो न करो। माँ तो छोटे को लेकर कमरे में चली गईं, पर देबू सन्न-सा खड़ा रह गया। उसकी रुलाई फूट पड़ी। बच्चों के पिता दफ़तर जाने के लिए अपने कमरे में तैयार हो रहे थे। देबू का उतरा हुआ चेहरा देखकर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा और पूछा गृहकार्य पूरा कर लिया है?
देबू ने हाँ में सिर हिला दिया। शुभो जब कमरे से बाहर निकला तो राजकुमार-सा लग रहा था। बड़े भाई को देखकर प्यार से बोला- दादा, मैं जा रहा हूँ।
देबू ने देखा, माँ ने सुबह वाली नीली साड़ी उतारकर, वही जो उसको बहुत पसंद थी, गुलाबी साड़ी पहन ली थी। पर अभी उसे माँ बिलकुल अच्छी नहीं लगीं। देबू को तो उस माँ को देखने की इच्छा थी, जो सुबह देबू के उठते ही उसे गले से लगा लेती थीं, अपने हाथ से गिलास भरकर दूध पिलाती थीं, पर अब उसकी जगह शुभो ने ले ली थी।
यह देखकर देबू को और भी दुख हुआ कि बल्कि आदेश देकर शुभो के साथ चली गई-मेरेजाते समय भी माँ ने उसे प्यार नहीं किया,आने से पहले स्कूल मत जाना।
माँ तो चली गईं, परंतु अब देबू का गुस्सा फूट पड़ा- ठीक है, माँ को तो मेरी परवाह नहीं है। सारा दिन छोटे का ही ध्यान रखती हैं। लगता है, जैसे मैं घर में ही नहीं रहता। ठीक है, जब मैं रहूँगा ही नहीं, तब पता चलेगा, बड़ा बेटा कैसा था। बड़बड़ाते हुए देबू ने माँ की एक साड़ी उठा ली। पता नहीं क्यों, आज उसे माँ पर बड़ा गुस्सा आ रहा था।
माँ की साड़ी को मोड़कर वह एक थैली में रखने लगा। अगर बाहर माँ की याद आएगी तो वे न सही, उनकी साड़ी तो होगी। माँ से बिछुड़ने की बात सोचते ही उसका मन भरने लगा था।
“देबू...!" तभी एक आवाज़ गूँजी। दरवाज़े पर उसके चाचा-चाची खड़े थे। वे पास ही में ठाकुरपुर के इलाके में रहते थे।
"चाचा, अभी जाओ! मैं ज़रूरी काम कर रहा हूँ।" देबू गुस्से से बोला
"अरे! जरा देखूँ तो मेरा बेटा क्या कर रहा है" कहते हुए उसके चाचा-चाची के अंदर आ गए।
"मैं मैं... कहते कहते देवू अटक गया। फिर हिम्मत करके बोला "मैं छोड़कर जा रहा हूँ।"
"क्या? अरे क्या हुआ मेरे बच्चे को, जो ऐसी बातें कर रहा है? "कहते हुए ने उसे अपने गले से लगा लिया।
प्यार पाकर देवू फट पड़ा। सारी बातें बताकर बोला में घर से जाना चाहता है क्योंकि माँ मुझे प्यार नहीं करती।
"तो यह बात है। आने दो भाभी को ऐसी डॉट लगाऊँगा कि दुबारा मेरे बच्चे वकुछ कह ही नहीं पाएँगी- चाचा ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा। क्यों जी, देवू को तो उसकी माँ प्यार करती नहीं क्यों न हम देवू को अपने साथ ले जाएँ।" चाची हँसते हुए बोलीं।
"हाँ हाँ, ले चलो मैं चलूँगा" कहते-कहते देवू अटक गया। फिर बोला "शुभो को भी साथ ले चलेंगे। वह मुझे बहुत प्यार करता है। माँ गदी है। उन्हें नहीं ले जाएँगे।"
अब तक देवू की माँ आ चुकी थीं। देबू जोर से बोला- "मेरे कपड़े दो मै छोड़कर जा रहा हूँ।"
"कहाँ जा रहा है मेरा बेटा?"- माँ ने प्यार से पूछा। "चाचा-चाची के साथ"-उत्तर मिला।
"ठीक है, पर मैं भी चलूँगी" माँ हँसकर बोली।
"क्यों?" - सवाल हुआ।
"क्योंकि मैं अपने बेटों के बिना नहीं रह सकती" कहते हुए माँ ने बेटे को अपने में लिपटा लिया। ममता की गरमी से देबू पिघलने लगा।
"मुझे छोड़ो, मुझे जाना है" देबू अपने को छुड़ाने लगा।
"हाँ, जल्दी करो बेटे, गंदी माँ को यहीं छोड़कर मेरे साथ चलो" चाचा नेउकसाया।
"मेरी माँ गंदी नहीं हैं" अचानक देबू चीखा। "मेरे कपड़े दो मुझे जाना है" कहते हुए वह माँ के पीछे छिप गया।
"कहाँ जाएगा बेटा?" माँ ने हँसते हुए उसका हाथ पकड़कर सामने खड़ा किया।
"स्कूल नहीं जाना क्या...?" -कहते हुए वह स्नानघर बाथरूम) की ओर दौड़ गया। न तो उसका साफ़ हो गया था, अब शरीर भी तो साफ़ करना था। आखिर माँ के कारण ही उसे कूल में सबसे साफ़-सुथरे लड़के का पुरस्कार पिछले पाँच साल से मिल रहा था।
