नन्ही चिड़िया
नन्ही चिड़िया
एक छोटी-सी, प्यारी-सी, नन्ही-सी चिड़िया 'फुदकू' थी। सुबह-सुबह वह फुदक- फुदककर बगीचे में चीं-चीं करती थी। वह कभी इस पेड़ पर तो कभी उस पेड़ पर जा बैठती, क्षणभर भी टिककर नहीं बैठती। उसके भूरे पंख, छोटी-सी चोंच और लाल-लाल पंजे देखकर सभी फूल खुश हो जाते। गेंदा उसे देखते ही कह उठता, “आओ मेरी फुदकू, दो-चार घड़ी आराम कर लो। उछल-कूद कर थक गई होगी।' "अरे नहीं! मेरा तो यही काम है। अभी कई दोस्त जागने के लिए मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।" कहते हुए वह आगे बढ़ जाती। उसे देखते ही सब खुश हो जाते। एक दिन सूरज निकले काफ़ी समय बीत गया। बगीचे में कोई चहल-पहल नहीं थी। सभी अलसाई आँखों से फुदकू का इंतज़ार कर रहे थे, पर आज उसका कोई अता-पता नहीं था। गुलाब ने हवा से पूछा- प्यारी पवन, क्या तुमने हमारी फुदकू को देखा है?
“हाँ, आज वह अपने घोंसले में है। उसकी तबीयत ठीक नहीं है।" पवन ने कहा।
गेंदे ने उत्सुकता से पूछा- क्या हुआ फुदकू को? हवा ने बताया कि उसे ठंड लग गई है। तभी खनकू खरगोश उछलता हुआ बगीचे में पहुँचा। उसने लताओं से पूछा, क्या हुआ? तुम सब चुपचाप क्यों हो?" लताएँ बोलीं- हमारी फुदकू बीमार है। वह हमें जगाने नहीं आई, पता नहीं कब ठीक होगी।
तुलसी ने कहा-खनकू भाई, तुम मेरी पत्तियाँ ले जाकर फुदकू को दे दो। इन्हें खाकर वह ठीक हो जाएगी। बेरी ने अपने दो-चार बेर गिरा दिए, अमरूद के पेड़ से पके अमरूद अपने आप गिर पड़े। गेंदा, गुलाब, जूही ने अपने खुशबूदार फूल भेजे। खनकू ने सभी वस्तुएँ एक थैली में डालीं और दाँतों से थैली उठाकर फुदकू के घोंसले की ओर चल दिया।
फुदकू अपने घोंसले से बाहर निकल, थकी-माँदी, दाने ढूँढ़ रही थी। खनकू को देख वह बोली-"भाई, तुम यह क्या ले आए?"
खनकू बोला- "अब तुम्हारी तबीयत कैसी है? बगीचे के पेड़-पौधों ने तुम्हारे लिए फल-फूल तथा शुभकामनाएँ भेजी हैं। "
फुदकू आश्चर्य से थैली में रखी वस्तुओं को देखने लगी। उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसे अपने दोस्तों पर गर्व हुआ।अगले दिन फुदकू • सुबह ही ने बगीचे में जाकर चीं-चीं करना शुरू कर दिया। चारों ओर हँसी और खुशी का माहौल था।
