चाश्नी
चाश्नी
चाश्नी
डोरा स्कूल से थकी मांदी घर लौटी। उसने अपना बैग मेज़ पर रखा और धीमे-धीमे क़दमों से अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी। तभी उसको घर में एक अलग- सी महक आई। ये महक किसी हींग-जीरे के तड़के वाली दाल की नहीं थी, न उबले चावलों की और न ही प्याज़ में भुनी किसी सब्ज़ी की। ये कुछ जानी पहचानी सी भीनी-भीनी महक थी। डोरा अचानक रुकी। जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, वह भागकर किचन में गई। मम्मी रोज़ की तरह कुछ काम कर रहीं थीं।
डोरा ने तपाक से पूछा - मम्मी! रसगुल्ले बने हैं क्या ?
मम्मी ने अपना काम करते हुए जवाब दिया - डोरा कपड़े चेंज करो, हाथ मुँह धोकर खाना खाओ। टेबल पर सलाद रखा है वह भी ले लेना। और बैग कहाँ रखा ?
डोरा ने सब अनसुना कर दिया। उसने स्लैब पर रखे डोंगों और पतीलों को उघाड़कर रसगुल्ले ढूँढना शुरू कर दिया।
मम्मी ने पलट कर जब उसको देखा तो बोलीं - उफ़्फ़ डोरा, गंदे हाथ खाने में मत लगाओ। जाओ जाकर कपड़े चेंज करो और हाथ मुँह धो कर खाना खाओ।
डोरा ने दोबारा पूछा - हाँ मम्मी, पहले बताओ! रसगुल्ले बने हैं न ?
मम्मी बोलीं - हाँ बेटी। रसगुल्ले ही तो बना रही हूँ तेरे लिए।
डोरा - वाह.... !! बन रहे हैं अभी? और कितना टाइम लगेगा?
मम्मी - बस चाश्नी बन जाए उसके बाद कुछ ही देर में रसगुल्ले तैयार हो जाएँगे। अब चलो, तब तक बाकि काम निपटा लो। फिर आराम से रसगुल्ले खाएँगे।
डोरा - वाह... मज़ा आ गया, मेरी प्यारी मम्मी!
डोरा ख़ुशी से किचन में ही नाचने कूदने लगी। और नाचते नाचते उसका हाथ स्लैब पर रखे चीनी के खुले डब्बे पर पड़ा। सारी चीनी ज़मीन पर बिखर गई।
मम्मी ने झल्लाकर बोला - ओह ये क्या किया डोरा ! अब रसगुल्लों के लिए चाश्नी कैसे बनेगी।
डोरा बोली - ओह सॉरी मम्मी। ग़लती से हाथ लग गया। आप चिंता मत कीजिए। मैं अभी भागकर नीचे महाजन स्टोर से चीनी ले आती हूँ।
मम्मी से कुछ पैसे लेकर डोरा पास की दुकान से चीनी ख़रीदने चली गई। दुकान के गल्ले पर महाजन की 4 साल की बेटी गिन्नी बैठी थी। गिन्नी अक्सर ही स्कूल से लौटकर अपने पापा की दुकान में जा बैठती थी। वहाँ उसका जितना मन करता था उतने टॉफ़ी चॉकलेट खाती थी। आज भी वह चॉकलेट ही खा रही थी।
डोरा दुकान पर पहुँची।
उसको देखकर गिन्नी बोली - जी? बताएँ?
छोटी सी गिन्नी को ऐसे बोलते देखकर डोरा थोड़ा मुस्कुराई और बोली - आपके पापा, महाजन अंकल कहाँ हैं?
तभी महाजन दुकान के अंदर से आया और बोला - हाँ बेटी बताओ क्या दूँ ?
डोरा - अंकल 2 किलो चीनी दे दीजिये।
महाजन चीनी लेने अंदर चला गया।
गिन्नी ने धीरे से डोरा से पूछा - हम्म्म... चीनी कितनी टेस्टी होती है न , मीठी-मीठी! इतनी सारी चीनी क्यों चाहिए आपको?
डोरा यूँ तो केवल 12 साल की थी लेकिन अपनी उम्र के हिसाब से वह बहुत समझदार थी। गिन्नी से मस्खरी करते हुए वह बोली - चाश्नी के लिए चाहिए, मेरे घर रसगुल्ले जो बन रहे हैं।
रसगुल्लों का नाम सुनते ही गिन्नी का मासूम चेहरा खिल उठा और वह बोली - रसगुल्ले ! वाह.. !
अब रसगुल्ले वाक़ई होते तो बहुत लाजवाब हैं। मीठे मीठे, सफ़ेद रंग के। लेकिन ऐसे किसी से कुछ माँगना अच्छी आदत नहीं होती। गिन्नी को उसकी मम्मी रोज़ यही समझतीं थीं। सो गिन्नी ने रसगुल्ले माँगे नहीं।
लेकिन बड़ी दुविधा थी। रसगुल्ले तो खाने ही थे। तो क्या किया जाए? तभी उसका दिमाग दौड़ा और उसने बेहद मासूमियत से डोरा से पूछा - तो कितने? कितने रसगुल्ले बनाये हैं आपकी मम्मी ने?
गिन्नी का सवाल सुनकर डोरा सब समझ गयी। वह थोड़ी अचंभित तो हुई लेकिन उसे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि गिन्नी ने रसगुल्ले माँगे नहीं। वह गिन्नी से बोली - चलो मेरे घर, तुम खुद ही चलकर गिन लो।
गिन्नी को सुझाव अच्छा लगा और वह मान गयी। डोरा ने चीनी का थैला उठाया और गिन्नी को अपने साथ घर ले आई। उसने सारी बात अपनी मम्मी को बताई। मम्मी को यह देखकर ख़ुशी हुई कि उनकी बेटी कितनी समझदार है। और वैसे भी उन्होंने कुछ रसगुल्ले ज़्यादा बनाये थे।
कुछ ही देर में चाश्नी तैयार हो गयी और रसगुल्ले बन गए। एक छोटी-सी मिट्टी की हंडिया में नरम-नरम रसगुल्ले रख कर ले आईं।
रसगुल्लों को देखकर गिन्नी की आँखें चमक उठीं और वह बोली - रसगुल्ले.... ! वाह ये तो बहुत टेस्टी लग रहे हैं।
डोरा (शरारत भरे अंदाज़ में बोली) - हाँ टेस्टी तो होंगे ही। तो इन रसगुल्लों गिनती के लिए तैयार हो गिन्नी ?
गिन्नी भी कम न थ। रसगुल्लों को देखते ही वह बोली - डोरा दीदी मैं आपके लिए यह रसगुल्ले गिन तो दूँगी लेकिन इनको गिनने के बदले में मुझे क्या मिलेगा ?
डोरा उसकी शरारत समझ गई और बोली - हम्म्म ज़रा सोचने दो..
गिन्नी - मैं बताऊँ दीदी? कुछ आपके आसपास ही रखा है , मिट्टी की हंडिया में।
डोरा - रसगुल्ले? हाँ ये ठीक रहेगा.. क्यों गिन्नी !
गिन्नी - हाँ बिल्कुल ठीक रहेगा।
और फिर गिन्नी ने मुड़कर डोरा की मम्मी से कहा - आंटी मुझे 4 रसगुल्ले देना!
गिन्नी की शरारत पर डोरा और उसकी मम्मी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। और फ़िर सबने मिलकर नरम-नरम, गोल-गोल, मीठे-मीठे रसगुल्लों का आनंद उठाया।
- शिवांगी शर्मा
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