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kiran singh

Children

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बच्चों को रामकथा का अमृत रसपान

बच्चों को रामकथा का अमृत रसपान

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 ‘ श्री राम कथामृतम् ‘ कवयित्री द्वारा राम चरित को सरल, सहज एवं सुबोध शब्दों में बालोपयोगी सांचे में ढालने का सत्प्रयास है । मूलतः इस कृति के पीछे 2020 की कुछ घटनाएं कवयित्री ने ‘अपनी बात ‘ में बताया है: (1) ‘ कौन बनेगा करोड़पति ‘ में संजीवनी बूटी संबंधी जानकारी से अनभिज्ञता (2) लब्थप्रतिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा साहित्यिक चर्चा के दरम्यान बाल साहित्य को हर साहित्यकार की नैतिक जिम्मेदारी बताना (3) कोविड 19 महामारी की रोकथाम के लिए आरोपित लाकडाउन का रचनात्मक कार्य में सदुपयोग (4) लाॅकडाउन की अवधि में रामानंद सागर द्वारा फिल्माया रामायण का दूरदर्शन पर प्रसारण।

     यह इत्तफाक है कि इस पुस्तक के अध्ययन करते वक्त मेरा ध्यान एक दिलचस्प समाचार की ओर आकृष्ट हुआ जिसकी चर्चा प्रसंगवश कर रहा हूँ । भुवनेश्वर के 10 साल के आयुष कुमार खुंटिया ने लाॅकडाउन के दौरान प्रसारित होने वाले रामायण सीरियल पर आधारित दूरदर्शन सीरीज देखने के बाद बच्चों के लिए उड़िया में रामायण लिखी है। 100 पन्ने वाले इस किताब का नाम पिलाका रामायण (बच्चों के लिए रामायण) रखा गया है।

     स्वभावतः बच्चे गूढ़, मोटी और गंभीर किताबों से भागते हैं। पढ़ने में रूचि विकसित होने पर बच्चों को अपने मानसिक विकास के लिए ऐसे बाल साहित्य की जरूरत पड़ती है जिसे वे अपना समझकर आत्मसात कर लें । ऐसा साहित्य मनोरंजन के अलावा बालकों में नेक भावनाओं का उदय करने में भी सहायक होता है । कवयित्री ने बाल साहित्य की बुनियादी आवश्यकताओं को भलीभांति ध्यान में रखकर इस खंड काव्य की रचना की है ।

         रामचरितमानस के अक्षुण्णतत्व एवं सूत्र-संकेत सर्वकालिक है जो आज के युग-संदर्भ में भी सर्वथा सही उतरते हैं । राम का बहुआयामी, भव्य एवं महनीय चरित्र सदियों से रचनाकारों को उन पर लिखने के लिए प्रेरित करता रहा है । राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने तो यहाँ तक कह दिया:

           “ राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है,

              कोई कवि बन जाये सहज संभाव्य है।“

        जयशंकर प्रसाद ने लिखा है:

        “ अखिल विश्व में रमा हुआ है राम हमारा,

          सकल धरा पर जिसका क्रीड़ापूर्ण पसारा ।“

  मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा को खंड काव्य के रूप में बालकों के लिए प्रस्तुत करने का सुप्रयास कवयित्री द्वारा इसी श्रृंखला में एक कड़ी है ।

         समस्त रामचरितमानस में राम को सत्य, न्याय, क्षमा, उदारता, कृपा और स्नेह का उच्चतम भाव प्रदर्शित करते हुए चित्रित किया गया है । निस्संदेह मानव के सद्गुणों का समन्वय उसी में निहित है जिससे समाज, वर्ग, परिवार और व्यक्ति की मर्यादा सुरक्षित रहे। राम मर्यादा के संरक्षण में सर्वोत्तम हैं । इन्हीं उच्चतम गुणों को बच्चों के प्रभाव्य मस्तिष्क में बीजारोपण के सोद्देश्य से कवयित्री ने अत्यल्प एवं अत्यंत सरल शब्दों में पूरे रामायण का मर्म को गूंथने का कठिन कार्य बखूबी किया है ।

      ध्यातव्य है कि रामचरितमानस के प्रणेता गोस्वामी तुलसीदास ने खुद बाल्यकाल मे अपने कोमल मन-मस्तिष्क में ऊँचे भावो के बीजारोपण के महत्व को स्वीकारा है । सौभाग्यवश बाल्यावस्था में उन्होने सूकर क्षेत्र में अपने गुरू के मुख से रामकथा सुनी थी । स्वाभाविक तौर पर शिशु-काल में उन्हें राम चरित का पूरा बोध नहीं हो सका था । इस बात का संकेत उन्होंने रामचरितमानस के प्रारम्भ में इस प्रकार किया है:

        “ मैं पुनि निज गुरू सन सुनी कथा सो सूकर खेत ।

          समुझि नहीं तसि बालपन तब अति रहेऊॅ अचेत ।।“

     गुरु मुख से रामकथा सुनकर गोस्वामी जी के बाल-हृदय में राम चरित का बीज तो अंकुरित हो गया था किन्तु उसका पल्लवन उनके परवर्ती जीवन में हुआ और उन्होंने युगांतरकारी महाकाव्य की रचना की ।

               रामायण में प्रभु राम का चरित्र उदात्त होते हुए भी सुख-दुःख से उद्वेलित होता हुआ दिखलाया गया है जिससे वे सामान्य मानव की कोटि मे आ जाते है । उनसे आत्मीयता स्थापित हो ज़ाती है और उनके हर्ष-विषाद में उल्लसित और दुखी हो जाता है । अरण्यकाण्ड में सीता-हरण हो जाने पर राम की करूणपूर्ण दशा का चित्रण बड़े मार्मिक ढंग से किया है:

      “ हे खग-मृग हे मधुकर सेवी। तुम देखी सीता मृगनैनी ।

         यहि विधि खोजत विलपत स्वामी । मनुहॅ कहा विरही अति कामी।“

       कवयित्री ने इसी भाव को सरल शब्दों में बालकों को सहजता से ग्रहण करने हेतु यों लिखा है :

       ‘ लगे राम-लक्ष्मण फिर करने/ सीताजी की खोज/

         भटक-भटक कर दोनों भाई/ भूले अपना ओज /’

          हनुमान द्वारा गिरि से औषधि ले आने पर राम की प्रसन्नता अवर्णनीय है-

          “ हरखि राम भेटउ हनुमाना । अति कृतज्ञ प्रभु परम सुजाना ।“

कवयित्री ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है:

‘ भरत वाण से अतिशीघ्र ही/ पहुंच गये हनुमान/

  हुए प्रसन्न तब राम लिया / सबने ही लोहा मान/’

         तुलसीदास जी ने अयोध्याकांड में केवट प्रसंग का वर्णन बड़े ही भावोत्पादक ढंग से किया है । ( बाल्मीकीय रामायण में यह प्रसंग बिलकुल नहीं है । वहां राम नाव चढ़कर शीघ्र पार कर लेते हैं।) तुलसीदास जी ने केवट से कहलवाया है कि-

“ पद कमल धोई चढाई नाव न नाथ उतराई चहुँह।“

क्योंकि – “ छुवत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तैन काठ कठिनाई । तरनिऊ मुनि धरनी होई जाई। बाट मोरि नाव उड़ाई ।“

कवयित्री ने इस प्रसंग का वर्णन यों किया है:

        ‘ केवट बोला, कहीं बनें न / नारी मेरा नाव/

          इसीलिए मैं प्रथम आपका/ धोऊँगा यह पाँव ।।‘

    कवयित्री ने समुद्र द्वारा राह नहीं देने पर राम के क्रोध का वर्णन इस प्रकार किया है :

    ‘ पूजा करने लगे राम जी/ रखे तीन दिन धीर/

      किन्तु जलधि ने दी न राह तो/ तान लिए वे तीर/’

( “ विनय न मानहि जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।

    बोले राम सकोप तब, भय बिनु होहिं न प्रीति ।“)

           तुलसीदास जी ने लिखा है :

 “ कवि-कुल वनु पावन जानी। राम-सिया जस मंगल खानी।

   तेहि ते मैं कछु कहा बखानी/ करन पुनीत हेतु निज बानी।“

( सीता और राम के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगोलों की खान जानकर, मैंने भी अपनी वाणी पवित्र करने के निमित्त उसका थोड़ा सा वर्णन कर डाला हूँ ।)

कवयित्री ने भी रामचरितमानस के पात्रों के माध्यम से बच्चों के लिए सदाचार, भातृभाव, सेवा, नैतिकता एवं सत्यनिष्ठा की सीख देने का पुनीत कार्य किया है।

      इस रचना में सादगी और मिठास के साथ सहृदयता और प्रांजलता मौजूद है। प्रसंगानुकूल चित्रों का समावेश प्रभावोत्पादक है और बच्चों को भायेगा। इस कृति में बच्चों की रूचि के अनुकूल ही भाव , भाषा, शैली, प्रवाह आदि वर्तमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बालकों की सहज वृति में तारतम्य होकर यह खंड काव्य उद्भूत हुई है। निस्संदेह बच्चे इस सोद्देश्य काव्य से लाभान्वित होंगे और भावी जीवन में चारित्रिक उत्थान की दिशा में अग्रसर होंगे ।



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