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Faisal Rizvi

Drama

4  

Faisal Rizvi

Drama

बारिश

बारिश

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तेज़ होती बारिश ने गाने की आवाज़ कम करदी थी।

बारिश की बूंदों की टप टप इतनी लयबद्ध थी मानो गाने के साथ सुर मिला रही हो।

मेने इयरफोन निकाल दिया। बूंदो की ज़मीन पे गिरने की आवाज़ ओर तेज़ हो गयी। ऐसा मानो किसी महान संगीतकार ने दिन रात एक करके कोई संगीत बनाया और पूरा आर्केस्ट्रा उसको बजा रहा हो।

मेने खिड़की की तरफ करवट ली। और बाहर की और देखने लगा। हर 10-15 सेकण्ड्स के बाद एक ठंडा हवा का झोंका आ रहा था सो मेने चादर ओढ़ने का फैसला किया।

 बारिश की वजह से मिट्टी इतर की तरह महक रही रही थी।

इस सम्मोहन में, मैं खोता तो बार बार हवा का झोंका आके मुझे हक़ीक़त का अहसास दिलाता था। कुछ देर बाद हवा आनी बंद हो गयी। धीरे धीरे सब शांत होने लगा।

मानो सब कुछ ठहर गया हो, कुछ देर बाद आवाज़ आयी

सुनो।

मैंने बाहर की और देखा। वहाँ कोई नही था।

दौबारा वही आवाज़ आयी।

सुनो।

अबकी बार मेरी नज़र खिड़की पे गयी। जो बारिश से तकरीबन गीली हो गयी थी। सुनो।।

अबकी बार आवाज़ देने वाला मुझे दिख गया।

जिसने मुझे हैरत में डाल दिया। बारिश की बूंदो से वो आवाज़ आ रही थी।

हा। तुम्ही से कह रही हूं। कुछ देर तक मैं असमंजस में था।

बोलो !! एक बार फिर आवाज़ आयी।

हाँ तुम बोल कैसे सकती हो? मैने सवाल किया 

ये जरूरी नही। जवाब आया।

जरूरी ये है। तुम उदास क्यों हो ? बूंदो ने अपनी बात पूरी की 

मैं नही तो ! तुम्हे किसने कहा ? मेने हल्का सा मुस्कुराकर जवाब दिया। 

तुम्हारो आँखों ने कहा।  उधर से सीधा सा जवाब आया।

हा हा। आँखों ने।  आँखे केवल देखती हैं।  दिखाती नही हैं कुछ। मेने हँसते हुए जवाब दिया।

नही तुम हो।  बूंदो ने अपनी बात पे अड़ते हुए कहा।

हाँ हुन ! लेकिन तुम्हे क्या ? मेने चिढ़ते हुए जवाब दिया।

हमें दुख हैं  के रहबर आज खुद राहगीर हैं। उधर से आवाज़ आयी।  

लफ़्ज़ों से मत खेलो कोई सलाह है तो बताओ मेने मुह बनाते हुए कहा।

परेशानी क्या हैं।

परेशानी। बयां करुगा तो शाम हो जाएगी। तुम तो आँखे पढ़ना जानते हो। पढ़ लो।

अबकी बार बूंदे के पास जवाब नही था। कुछ वक्त के बाद जवाब आया। 

वक्त से क्या गिला। वक्त कभी स्थिर नही रहता। 

कल का फ़क़ीर आज राजा हैं। आज का फ़क़ीर कल राजा होगा।

मेरी राय अलग हैं। 

तुम्हारी राय गलत भी तो हो सकती हैं।

बाकी लोग भी तो स्थिर ज़िन्दगी जी रहे हैं ! 

ऐसा नही है। परेशानियां सबको है। बस वजह अलग अलग हैं।

तुम नही समझोगे। तुम्हारी किस्मत लिखी हुई हैं। धरती से आकाश। आकाश से धरती।  

हां पर स्थिर तो मैं भी नही। मेरी किस्मत तो लिखी हुई हैं पर तुम लिख सकते हो खुद से। 

मेरे पास जवाब न था।  

अचानक बूंदे ऊपर उठी।  

कहा चली ? मैंने पूछा।

अपना लिखा पूरा करने। जवाब देकर वे मेरी ओर आने लगी। 

मैंने बचने के लिए  चेहरा दूसरी तरफ कर लिया। 

अचानक शून्य टूट चुका था।

मेरी आँख खुल चुकी थी। चेहरे पर बूंदे थी।

चादर लगभग उतर चुकी थी। हवा से खिड़कियां आपस में लग रही थी।

दिन ढलने को था और बारिश भी।  कई घण्टे बीत चुके थे। अक्सर ख्वाब हक़ीक़त दिखा जाते हैं। ओर हक़ीक़त को हम ख्वाब की की तरह जीते हैं। मैं भी उठा और चल पड़ा। 

जो लिखा हैं उसे पूरा करने। कुछ खुद से लिखने।


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