अरण्य कथा- “हर पेड़ कुछ कहता है”
अरण्य कथा- “हर पेड़ कुछ कहता है”
अरण्य "चांदनी रात की इस रोशनी में हमारा परिवार कितना सुंदर लग रहा है और कल हमारा दिन है।"
अरुणिमा "हां देख रही हूं कैसे ये जगह जगमगा रही। मगर अरण्य पहले मैं कटूंगी, नहीं पहले तुम नहीं पहले मैं कटूंगा, नहीं नहीं अरण्य तुम नही पहले मैं। अरण्य अरुणिमा एक दूसरे के लिए लड़ रहे हैं। बुजुर्ग वृक्ष लम्बी गहरी सांस भरते हुए...आज की इस चांदनी रात में लहराने का मन कर रहा जरा सुनो झरने की कल कल करती आवाज और देखो वहां देखो वो प्यारा चीता कैसे पलकें झपकाए सुकून से सो रहा। हमारे परिवार के सभी जीव जंतु मासूम पक्षी आज इस उम्मीद भरोसे पर सो गए हैं कि बुजुर्ग अरण्य अरुणिमा सबको सुरक्षित रखेंगे। इस परिवार को बचाने का दायित्व हमारे बूढ़े कांधों पर है अरण्य। आसपास बस अपने इन दोस्तों के अलावा उन्हें नही पता कल प्रहार हम पर होने वाला है।
कहानी की शुरुआत कुछ इस तरह है अरण्य अरुणिमा झरने के किनारे बसे दो बुजुर्ग वृक्ष हैं कल की सुबह आधुनिकता की भूख इन्हें भी काटने वाली है मगर दिलचस्प बात ये है कि क्या अरण्य अरुणिमा के साथ साथ पूरे परिवार को सुरक्षित रख पायेगा। कहानी की ओर.....
अरण्य (लंबी गहरी सांस लेते हुए) जैसे ही अरुणिमा की तरफ देखता है एकटक देखता ही रह जाता है वही मासूमियत उतनी ही शिद्दत। आज भी इस बूढ़ी उम्र में इंशाअल्लाह चाँद की चांदनी में दमकता ये चाँद नीचे मेरे पास। आज भी तुम उतनी ही खूबसूरत दिख रही हो अरुणिमा मगर ये आंखे सागर सी भरी हुई मायूस हैं।"
अरुणिमा "हम कल की सुबह में क्या देखेंगे और हमारे रोने या चीखने का इस इंसान को कोई एहसास तक नहीं होगा। वही आधुनिक दुनिया के लोग जो कि निर्मम हत्या कर रहे होंगे और रोकने वाला कोई नही। हमें हमारी चिंता नही मगर कल हम नहीं रहेंगे तो हमारे परिवार के सदस्य टूट जायेंगे।"
अरण्य "जानती हो अरुणिमा हमारे खत्म होने से एक दिन दुनिया भी खत्म हो जाएगी ये बात जानते हुए भी ये इंसान पेड़ों की कटाई करते रहते हैं। हमारा भी परिवार होता है, इसी इंसान की तरह हमारी भी रिश्तेदारियाँ होती हैं, सगे संबंधी होते हैं, इस जंगल से उस जंगल मे। यहां तक कि दूर दूर तक बसे जंगलों में (वृक्षों की प्रजातियां, वनस्पति, जीव जंतु) आदि।" इतना सुनते ही अरुणिमा ने अरण्य के होंठो पर अंगुली रख ली और अरण्य ने अरुणिमा की आंख से आया अश्रु अपनी अंगुली पर ले लिया।
"अरुणिमा कुछ पल के लिए सबकुछ भूल जाओ मैं तुमसे वादा करता हूँ हम दोनों मिलकर हर सम्भव प्रयास से अपने परिवार को बचाएंगे।
आओ अरुणिमा कुछ पल के लिए बीते दिनों की उस उमंग को फिर जी लें। अपने पवित्र प्रेम को साक्षी मानकर ये पल साथ जीते हैं कल की कोशिश काम आएगी या नहीं मगर बेइंतहा प्यार ही हमें हौसला देगा ।"
अरण्य ने अरुणिमा का हाथ पकड़ा और अरुणिमा ने अपना सिर अरण्य के कंधे पर रख दिया।
अरण्य "तुम्हें याद है जब एक बार जोर की वर्षा हुई थी तो तुम कैसे झरने में गिरी पड़ रही थी।"
अरुणिमा "हाँ और तुमने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे तीव्र झरने में बहने से बचा लिया। उस समय हम यही लगभग 1 ,2 महीने के थे छोटे छोटे बच्चे..."
अरण्य "हां बड़ी अम्मा हाथ पकड़ा नहीं था थामा था हमेशा हमेशा के लिए। अरुणिमा एकदम से पलकें झुकाये शर्मा गयी।"
अरण्य "चलो हटो अब तो बुड्ढी हो गयी हो अब भी ऐसे ही शर्माओगी।"
अरुणिमा "आप रहने दीजिए अरण्य आप कौन सा बदल गए वही बचकानी हरकतें......झरने से पानी लेकर मुँह पर फेंकना।"
"अरण्य ये अच्छा याद दिलाया तुमने।"
अरुणिमा, "अरे अरे अरण्य प्लीज़ अब नहीं देखो बस हां बहुत हुआ। अरण्य "क्या बहुत हुआ हां
अरुणिमा तो ये लो...हा हा हा..."
एक दूसरे पर पानी फेंकते अरण्य अरुणिमा...
अरण्य हम दोनों साथ साथ इस झरने के किनारे इस ऊंची चोटी पर पता नहीं कैसे हँसते खेलते साथ साथ बड़े हो गए और आज बुजुर्ग वृक्ष की उम्र के पड़ाव में।
अच्छा तुम्हे वो दिन याद है जब मासूम हिरणी को प्रसव पीड़ा हुई थी और छोटा सुंदर केटू सबका चहेता बन गया।
ये प्रसव पीड़ा इंसानो की दुनिया मे भी होती है तब भी इन पर कोई फर्क नही पड़ता चले आते हैं हमारे परिवार हमारे बच्चों को सताने के लिए, उन्हें इधर से उधर पलायन करना पड़ता है। वो क्या जाने हमारी तखलीफ़ हमारी परेशानियाँ। नन्हें नन्हें बच्चे मासूम क्या हाल होता है उनका हमारे परिवार में भी गर्भवती मादाएं होती हैं। कल जब यहां वृक्ष कटना शुरू होंगे क्या होगा उस गर्भवती मादा हाथी का???
अरण्य यह सोचकर रूह कांप जाती है जीव जंतु मासूम पक्षी हमारे क्या होगा इन सबका???
अरण्य "इस आधुनिक मानव ने आधुनिकता का ऐसा पर्दा डाल लिया है जिसके आगे इन्हें हमारी विशाल सुंदर दुनिया दिखाई नहीं देती।"
अरुणिमा "अरण्य कुछ सोचिए।"
अरण्य "हम मिलकर आने वाली कल की सुबह यादगार बनाएंगे...
दो चार पास खड़े वृक्षों की आवाज हां अरण्य हम कल तुम पर प्रहार नही होने देंगे। आप सब निशचिंत होकर आराम कीजिये भरोसा रखिये हम पर और इस तरह अरण्य चाँद की ओर देखकर कुछ सोचने लगता है। कुछ क्षण सोचने के पश्चात अरण्य अरुणिमा से बोला क्यो न हम एक प्राथना पत्र लिखें फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को, अपने माननीय प्रधानमंत्री जी को इसे स्वयं ही पहुचाएंगे और बांकी दुनिया वालों के लिए अरुणिमा तुम्हे वो पंक्तियाँ याद हैं जो हम अक्सर गुनगुनाते हैं। हां तो हम हाथों में हाथ लिए इस पत्र के साथ अपने शीतल आकर्षिक मनोहर झरने में हवा के जैसे बहते जायंगे बस गुनगुनाते हुए बहते जायेंगे.......इस भरोसे पर हमारा यह पत्र सही हाथों में और ये पंक्तियाँ अच्छे मानुष के कानों में पहुँच जाएं..."
फॉरेस्ट डिपार्टमेंट,
नई दिल्ली,
महोदय,
सविनय निवेदन यह है कि जंगल (हमारे) बिना इस धरती की कल्पना भी नहीं कि जा सकती। आपका जीवन सीधे तौर पर प्रकृति से जुड़ा है पर जिस तेजी से हम जंगलों की कटाई कर रहे हैं इसका भुगतान आप सबको ही करना पड़ रहा है। जब आपका एक सदस्य जरा सा घायल हो या उसे हमेशा के लिए खो दें आपकी पीड़ा आप स्वयं जानते हैं। और हमारे यहां आप क्या करते हैं इतने निर्दयी होकर आड़ा तिरछा हर प्रकार से प्रहार करते करते हमारे एक एक सदस्य को जमीन पर बिछा देते हैं।
आपको नाममात्र भी एहसास नहीं होता मुझ जैसे तमाम अरण्य के अंदर क्या कोहराम मचा है अपने ही सदस्यों की लाशें बिछी देखकर अरण्य चीख चीखकर रोटा है आपको जोर जोर से आवाजें देता हैं बहुत पीड़ा हो रही है ना काटो हमें ना काटो हमें। ये हमारा परिवार है एक सदस्य की कमी जीवन भर पूरी नहीं होती और यहां लगातार एक के बाद एक सदस्य पर प्रहार और अरुणिमा वो बेचारी उसके ना अश्रु आते हैं ना ही चीखती है आँखे खुली की खुली और सदमें में.....
कृपया हमें महसूस कीजिये हमारे दर्द हमारी जिंदगी को समझिए। ओजोन परत लगातार सिकुड़ रही है। सैकड़ों बीमारियों की वजह से लोग अपनी जान दे रहे। शुद्ध वायु शुद्ध जल के लिए आप सब तरस रहे हैं सिर्फ एक देश ही बल्कि पूरे मानव समाज और दुनिया के लिए ये एक चिंता का सबब बना है।
भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश मे ये चुनौती और भी गंभीर हो जाती है। आप सब आधुनिकता के साथ प्रकृति का संतुलन बनाने में कामयाब हो सकते हैं वन सरंक्षण की दिशा में कड़े फैसले लेकर आने वाले नस्लों को जीवन दान दे सकते हैं।
वन रिपोर्ट 2019 (आई एस एफ आर ) बताती है देश के वन वृक्ष क्षेत्र में वृद्धि हुई है। भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश का वन और वृक्ष क्षेत्र दो साल में 50188 वर्ग किमी की बढ़ोत्तरी हुई है। हमें इससे बहुत संतुष्टि व राहत मिली है। हम आगे भी यही आशा करते हैं।
माननीय प्रधानमंत्री जी व आप सबके कमल चरणों मे कोटि कोटि प्रणाम...
कोटिशः धन्यवाद अरण्य अरुणिमा
दिनांक 2021.03.29
हे! प्रकृति माँ जोरो की हवा चला जिससे हमारी जड़ें ढीली पड़ जाएं हम इस झरने में कुछ इस तरह गुनगुनाते बहते चले जाएं हमारा बलिदान व्यर्थ न जाए..
अरुणिमा पहले तुम बोलो, ठीक है अरण्य जी
अरुणिमा "पेड़ कटे
वसुधा विधवा हो जाए,
बात ये व्यथा भरी
मानव ही जान पाए ।
अरण्य "ये धरती का श्रंगार हैं
बिन श्रंगार,
हाय! यौवन फीका पड़ जाए
पेड़ कटे
वसुधा बेजान रह जाए,
बात ये व्यथा भरी
मानव ही जान पाए ।
अरुणिमा "फूल खिले, उजली किरण पड़े
फूलों को बालों में गूथे
खुले केश,
उड़े जुल्फें जब इसकी
हाय! आकाश भी शर्मा जाए
रुई बने जब बाती,
दीपक संग जल जाए।
बने काजल पौधों से
ये कजरा इसके,
नैनों में भर जाए
ओस जड़ी हीरों सी,
हरी भरी साड़ी पहने
बलाएं लूं इसकी,
सुंदर रूप
हाय! निखरता जाए
बात ये रहस्य भरी
मानव ही जान पाए।
अरण्य "लाल फूल खिले जब
सिंदूर ये मांग भरे,
मुस्कुरा कर
लाली जब लगाए
रंग बिरंगे,
फूल ही इसके गहने
गहनों से खुद को
ये कितना सजाए
स्वच्छ नदी न हो,
ये रूप कैसे निहार पाए।
पेड़ कटे
इसकी शोभा खो जाए
पेड़ कटे,
स्वच्छ नदी से दर्पण धुंधला जाए,
बात ये अचंभित
मानव ही जान पाए ।
अरुणिमा " बिन पेड़ो के बरसात कहां
ये अम्बर हमें बताए
बात ये सब जग जाने,
मानव ही इसे समझ पाए
ए! मानव तेरे बेबुनियादी कर्मों से,
इसका रूप उजड़ता जाए
बात ये अनोखी
मानव ही जान पाए।
अरण्य "पेड़ कटे
हाय! आँचल से इसके,
चुनरी हट जाए
आबरू इसकी,
छिप न पाए
आवाज ये चीखों भरी
मानव ही सुन पाए।
पेड़ कटे
वसुधा विधवा हो जाए,
बात ये व्यथा भरी
मानव ही जान पाए।
"साक्षी दीक्षा सुरेन्द्र सिंह सिकरवार
To be continued.......
