Buy Books worth Rs 500/- & Get 1 Book Free! Click Here!
Buy Books worth Rs 500/- & Get 1 Book Free! Click Here!

Pravin Kumar

Drama Inspirational


4.3  

Pravin Kumar

Drama Inspirational


अपनी माटी

अपनी माटी

12 mins 349 12 mins 349

नीम बेहोशी में भी 'चरना' सपनों की रंग-बिरंगी दुनिया में विचर रहा था। सपने अपने माया-लोक में चरना को द्रुतगति से घुमा रहे थे। प्यारी-सी खिलखिलाती 'छुटकी' चरना को मानो झिंझोड़ कर जगा रही हो"....पप्पा, ऐ पप्पा मुरगा खायम। अंडा लें दे न!.. नयका फ्राक पहिनके मेला जायम..."

बेहोशी में भी चरना को अपनी इस' लछमिनिया बिटिया' के प्रति बड़ी श्रद्धा हो रही है... 'मुनिया' से बियाह के आठ बरस बाद पैदा हुई 'छुटकी' डेढ़ बरिस के भीतर ही पीठ पर भाई लेकर जो आई है। बित्ता भर का है, बिच्छा जइसन। एकदम लम्पट, 'बिछोतिया' ...इसी से बेटे का पुकारुं नाम रखा है। 'बिछोतिया'....

सपने की गति तेज होती जा रही है। चरना अपने हाथ में पड़े सरकारी कागज़ को देख रहा है। सरकार ने दो डिसमिल जमीन भूमिहीन चरना को खेती के लिए दी है....हाड़ - तोड़ मिहनत से इ साल सबसे जादा फसल चरना के खेत में हुआ है..। नरसिंग गोसाई ऐसने किरपा करते रहिया, जय बाबा नरसिंग....चरना भक्ति-भाव से अपने 'ग्राम-देवता' का सुमिरन करता है। चरना देख रहा है, मुनिया गमकौआ तेल चुपड़कर, नागिन से लहराते केश की मोटी चोटी को मोड़कर खोपा बना ली है.. नागिन मानो कुंडली मार के उसके माथे पर चिपक गई है। उसके ऊपर टेस नारंगी रंग की साड़ी का घूंघट और भर मांग टहटह पीला सिंदूर...बड़ी-सी चमचम करती टिकुली... पक्के रंग की मुनिया, आज खबसूरती में 'अपसरा' को टक्कर दे रही है.. लाज से सिमटी मुनिया को चरना छूने की कोशिश करता है, परंतु हाथ नहीं उठा पाता...आह, गजबे सुन्नर लग रहलै आज.!!

"केतारी तो जादा कीनबैं हम, भगवान् इ दिन दिखाइल है तब, हमहूं अगल-बगल, गांव-टोला में केतारी बांटम...और हां, 'बापू' ला एगो ओढ़ना और 'माई' ला छापावाला साड़ी कीनब"

चरना अपनी 'भोली-मुनिया' पर मुग्ध है.. कितनी सरल मन की है मुनिया। अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगती, चरना से ज्यादा उसके मां-बाप की चिंता वही करती है"..." तोर सब साध पुरायम गे मुनिया" चरना कहना चाहता है किंतु होंठ फड़-फड़ाकर रह गये, आवाज़ भीतर ही घुट गई

     पूरे शरीर में कुछ गीलापन-सा महसूस हो रहा है। बड़ी तेज- तेज आवाजें कानों से टकरा रही हैं ....जोर से चरना ने पैर झटका

" ...देख रे हिल रहा है,पैर हिलाया... "

"....हां हां, हाथ का उंगली भी हिला था..."

".. अरे...ओंठ भी फड़फड़ाया..."

मूर्च्छा टूट रही थी, चरना ने आंखे खोली तो भीड़ से घिरा था....माई-बापू, मुनिया पास ही बैठे थे

"कइसन 'जी' हो बेट्आ?" कलपते हुए माई बोली

"ऐ चाची, मंतर और दवा दून्नों का असर है कि एतना भारी जहर तुरन्तें कट गया... अब ई रोवा-धोवा बंद करके चरना के धियान रखअ"

     शहर में पढ़ने वाले कोठीवाले बउवा जी ने कहा और फोन करके बुलाये गये डाक्टर साहेब से अंग्रेजी में कुछ बतियाते हुए, उन्हें साथ लेकर निकल गये

   ".. हां आ इ बरसात में सब लोगन धियान दिहा..। सांप-बिच्छू के दिन हे"

धीरे-धीरे भीड़ छंटती जा रही थी। मुनिया गर्म दूध का गिलास माई को थमा दी। छुटकी चिल्ला रही थी

"... पप्पा हम्मर दूध, हमहुं पीयम। "

बिछोतिया चरना के पांव पर अपनी पूरी ताकत से हाथ मारा तो बापू ने घुड़क दिया

".. पप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ"

बिछोतिया मुनिया के गोद में दुबक गया। मुनिया के माथे पर पीला सिंदुर दमक रहा था, वह आँख बंद किये, बुदबुदा रही थी

"..हमर सोहाग बनाये रखिह हो नरसिंग बाबा, अबकी कारतिक पुरनिमा के मेला में तोहरा केतारी चढायम हो नरसिंग गोसाई। "

इधर चरना भी मां के हाथों दूध पीते हुए नर्सिंग बाबा से मन्नत मांग रहा था...पटना-डिल्ली जाय के जुगत बना द हो नरसिंग गोसाई...उधरे मिहनत-मजूरी करबो ....सुनहीं उधर चकाचक सड़क है, पानी-बत्ती के कोई कमी नाय है...

घर-परिवार उधरे ले जायम...इ गांव-देहात में कुच्छो ना रखल है.. , दोसर के खेत में, सांप-बिच्छा के खतरा लेके, 

खटके पेट पालअ.. और बाकी दिन बड़कन लोगन के चाकरी करे से अच्छा है कि यहां से निकले के जातरा बना द हो नरसिंग गोसाई.. इच्छा पुर दिहा बाबा...हर साल कार्तिक पुरनिमा में केतारी चढायम, तोहर दुआरी आयम। ....तोहार जय हो गोसाईं बाबा....

 दीवाली के बीतते ही के छठ की तैयारियाँ अपने अंतिम दौर में थी। बड़का मालिक के घर गेहूँ धोने-सुखाने की जिम्मेदारी माई ने हमेशा की तरह संभाल लिया है। मालिक के घर का सब रीत-रिवाज माई को पता है, जबसे बड़की मलकिनी गुजरी है, मलकिनी-बहू, माई से पूछ-पूछ के ही छठ करतीं हैं...मजाल है की माई से पूछे बिना एक पुड़िया सेंदुर भी छठ-घर में रख दे कोई... लसुन-पियाज सब बंद

"बहू जी, जम-दुतिया(यम-द्वितीया) से 'पारन'तक रोज पांच गो छठ-गीत भोर और सांझ बेरिया में गाये के होते"

नाते-रिश्तेदारों से घर भरने लगा है। अहले सुबह हाथ-मुंह धोकर छठ-कमरे के बाहर बैठकर सूर्य भगवान के जागने की प्रतीक्षा में औरतें गीत गा रही हैं___

"...कवन कोठी जनमल देव आदितअ(आदित्य) देवा..

    उठु देवा भइ गेलैं बीहान... "

संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया है। बापू छठ के लिए सूप-दौरा बुन रहा है, बापू के बने सूप-दौरे की आसपास के गांवों में मुंहमांगी कीमत मिलती है

" अगे छुटकी, अबकी तोरा ले घघरी कीन देबों, घाट पर वही पहिन के जइहें." बापू दौरा बुनते हुए स्वयं में बुदबुदाता है.

         चरना बिछौतिया को कलेजे से लगाये कंबल में गरमाया पड़ा है। इ कंबल छुटकी के जनम पर कोठी से मालिक ने भिजवाया है, एकदम नया, कोड़ियन कंबल..चरना को तो नया में इसको ओढ़ने से गुदगुदी होने लगा था। ये बात याद आते ही चरना मुस्कुराकर कंबल से नाक-मुंह ढांप लिया। उसे 'महेसवा' का इंतजार है.। स्साला कब भेंट देगा? डिल्ली से तो 'दिवलिया' से दु रोज पहले आ गया था!!.। उसी के साथ डिल्ली निकल जायेगा

            मुनिया ने काली गुड़ वाली चाय सबको दे दी है, खुद नहीं पीयेगी। हां, छठ का कोई काम मुंह जुठाके भला कोई करता है क्या ?अभी कोठी में छठ-पूजा का काम फैला पड़ा है। गेहूं चुनने-बीछने का काम माई की बूढ़ी आंखों से अब नहीं हो पाता है, ये सब काम अब मुनिया ने संभाल लिया है। अब नाते-रिश्तेदार तो मेहमान है., वे सब कैसे करेंगे? झाड़ू-बुहारू, रसोई-चौका, सबको खिला-पिलाकर, बच्चों को चरना को सौंप, मुनिया सिर का आंचल संभालती, कोठी की ओर भागी। चरना उसके इस तेजी पर उसे छेड़ रहा है..

" तू तो डिल्ली-बंबे में रहे लायक है, सुने हि उधर सब हड़बड़ैले रहअ है....ओनै एकदमे फिट बइठबैं तू"

मुनिया उसकी बातें अनसुनी करती कोठी जाती छठ मैया का निहोरा कर रही है

" भूल-चुक छिमा करिह् छठी मैया, हम्मर लाज तोरे हाथ है। जे साग-सत्तु, निमक रोटी दैभु, ओकरे में करेजा जुडा़के यही रखिहअ मैया हमनीं के। हम्मर सोहाग बनायें रखिहा माई, लइका-बच्चा से कोखिया भरल रखिहा मैयापप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ"       

मलकिनी ने मुस्कराते हुए एक धुली-पुरानी साड़ी मुनिया को बदलने दे दी है। बहुत दिन से मुनिया की नजर इस पीले फूलवाली साड़ी पर थी। वह खुशी से अंदर कमरे में साड़ी बदलकर छठ-पूजा के काम पर लग गयी _"हम्मर मरद के सद्बुद्धि दिहा छठी माय, यही माटी के सरीर, यही माटी में मिल जाय, ऐतना भर बस निभा दिहा हो माय"_भाव-विह्वल मुनिया गेहूं का एक-एक दाना ध्यान से चुन रही है, कोई टूटा हुआ दाना पीस न जाय, नहीं तो प्रसाद अशुद्ध हो जायेगा

 माई के आते ही चरना बच्चों से फ्री हो गया। पहले सोचा कि महेसवा का खोज-खबर ले लें। किंतु याद आया, आम की लकड़ी फाडकर रखना है, छठ में तीनों दिन, दुनों पहर जरुरत होगा, सूप पर का प्रसाद में तो बहुते लकड़ी लगेगा। बावन सूप का परसादी बनाना कोई हंसी-ठट्ठा का बात है?....मलकिनी को उपवास में परेशानी नहीं होना चाहिए। छठ कोनों एक आदमी से होनेवाला 'परब' थोड़े है.पूरा विधि-विधान से करना होता है। कोई शहर है का कि, गैस के चुल्हा पर पूजा का परसादी बनेगा? सबको मिल-जुलकर करना होगा....इ बार तो ऐसन घाट सजायेंगें कि सब देखते रह जायेगा..केला का खंबा और गेंदा फूल का लड़ी से 'शादी का मंड़वा' जैसा घाट बनायेंगें...हां इ बार मालिक छठ का बख्सीस जब देंगें तो वह फोटो खींचनेवाला बड़का मोबाइल-फोन मांग लेंगा..। उससे मुनिया और बच्चों के फोटो खींचके डिल्ली ले जायेगा..फिर डिल्ली में फोटो खींचेंगा... लालकिला... परधानमनतरी का कोठी। मुनिया के बाल जैसी काली-लंबी सड़कें...!!

फटाफट लकड़ियों के गट्ठर तैयार हौ गयें। बोझा करीने से रखकर, चरना पोखर में झटपट नहाकर गेहूं पिसवाने भागा। उधर धान कुटाकर नया चावल भी पूजा के लिए रख लिया था। मिल पर भी छठ-गीत बज रहा था_

"मारबो रे सुगवा धनुस से, सुग्गा गिरी मुरुछाय,

सुगनी जे रोव है बियोग में, सुरुज देवा होव न सहाय..."

          गेहूँ का बोरा रखते ही, चरना के कानों में ये पंक्तियाँ पड़ी, चरना वही धम्म से बैठ गया, सांप काटने पर वह भी अचेत था तो मुनिया भी तो... मुनिया जे रोव है बियोग में...

जब डिल्ली जायेगा तो, मुनिया तो 'एकदमे हदस' (हताश) जायेगी" चरना भावूक हो गया...बेचारी भोली-भाली मुनिया कैसे घर-परिवार की जिम्मेदारी निभाएगी?... नहीं - नहीं मन कड़ा करना होगा। जिनगी में कुछो तो सुख उसको नहीं दियें... इ गांव में खटके ऐसने मर जायेंगेंपप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ""

" का रे चरना, का सोच रहलें? "खांसते हुए किसी ने कहा तो चरना उधर सिर घुमाकर पहचानने की कोशिश करने लगापप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ"

" ना पहचानें? "खांसते हुए फिर उसने कहा

" अरे महेसवा, कहां गायब हो गया था। तुमको खोज रहे थे तुम तो डिल्ली वाला हो गया है। "

महेसवा के हाव-भाव में शहरी होने की धमक थी शरीर पहले से पतला लग रहा था, हाथ में जलती सिगरेट थी। उसने जोर का सुट्टा लगाकर बेफिक्री से धुंआ उड़ाते हुए बोला__

"वो तो है यार... "

" केतना खांस रहा है रे...। ओने पी, यहां छठ-पूजा का गेहूँ है...। बाकी हमरा भी इ बार डिल्ली ले चलो, वही कमायेंगें."

" हां-हां क्यों नहीं। वहां मालिक से कहकर तुमको भी काम पर रखवा देंगें। "खाटी हिंदी में महेसवा बोल रहा था

चरना पर उसका प्रभाव हो रहा था,उत्सुकतावश उसने कहा_

" काम का करना होगा रे वहां? तू का करता है?

"हम तो होटल में काम करते हैं।तुमको भी रखा देंगें"

"अच्छा!"

चरना का मुंह खुला का खुला रह गया। आंखों में बचपन में देखे फिल्म 'नमकहलाल' के अमिताभ बच्चन का चेहरा आ गया....आज रपट जायो तो मुझे न उठइयों...। मुनिया की छवि के साथ स्वयं को जोड़ चरना लजा गया.। दुत्!..। उसे भी साथ ले जायेगा

" एतना खांसी है, डाक्टर को दिखाया नहीं है? सहर में तो बड़का-बड़का डाक्टर होगा"

"हां तो डाक्टर बड़ा तो फीस भी तो मोटा है"

__चरना के भोले प्रश्न सुन हंसते- खांसते हुए महेसवा बोला। थोड़ा रुककर फिर वह बोला__

"इ खां ई सहर का परसादी है... ऐतना गाड़ी - मोटर है कि, वहां खांसे बिना लोग समझेंगा कि,उ मर तो नहीं गया है? ...अब तक खांसा नहीं हैपप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ""

कहकर, महेसवा के 'हो-हो' करके हंसा तो चरना को यह बात कुछ ठीक नहीं लगी। वह उसे शाम को घर आने का न्यौता देकर आटा लेकर अपनी राह चल दिया

         मुनिया के हाथ की, लिट्टी और घर के आंगन की बैंगन-टमाटर का चोखा चटखारे लेकर महेसवा ऐसे खा रहा था, मानों कब से खाना नहीं खाया है। चरना ने हंसकर कहा__

 "का रे होटल में काम करके तो खूब रंग-बिरंग का खाना खाता होगा?"

महेसवा का चेहरा उतर गया, शायद चरना ने उसके दुखती रग पर हाथ रख दिया था। वह उसांसे लेते हुए उदास - कमजोर स्वर में बोला___

"नहीं रे, रहने-खाने का खर्चा मालिक नहीं देता है। साग-सब्जी बड़ी मंहगा है और जिस दिन काम पर नहीं जाओ तो मालिक रुपया काट लेता है."

पलभर में ही महेसवा के बोली में खनक आ गई, वह अपनी रौ में बोले जा रहा था___

" शहर है भाई, एक-एक मिनट का हिसाब-किताब है। हारी-बीमारी, परब-त्यौहार, किसी में भी छुट्टी नहीं है...। अभी बीस दिन का कमाई छोड़कर आयें हैं"

उसके चेहरे पर स्वयं पर अभिमान होने का भाव स्पष्ट था। चरना अजीब नजरों से उसे ताक रहा था.

चरना को मालिक के घर से मिलने वाले दवा-दारु, कंबल, नये-पुराने कपड़े - लत्तें, और अपने तथा आसपास के गांव के हाट-बाजार एवं मेले की रौनक और मुनिया का हुलसकर सिंगार का सामान तो, घर-गृहस्थी के कुछ सामान खरीदना याद आने लगा। अचानक वह महेसवा से पूछ बैठा___

"भौजी और लड़कन सबको इ बार लेले जायेगा ना तू?"

" परिवार कहां ले जायेंगें? शहर में रहने का जगह मिलना कोई खेल बात है? रहने का किराया में तो पूरा पगार खत्म हो जायेगा तो खायेंगें क्या? "

फिर हंसकर बोला__" मैं तो रैन-बसेरा में रह लेता हूँ और रूपये बचाता हूँ.इस बार तुम्हारी भौजी के लिए एगो फोन खरीद दिया हूँ, अब बापू के फोन पर उससे बात नहीं करना पड़ेगा। "

बीच-बीच में महेसवा का खांसना भी जारी थापप्पा के दर्द होई रे बउवा...ओइजे ना सांप काटल हइ"

मुनिया भीतर दरवाजे पर सब बात सुन रही थी, वह चरना की तरफ देख रही थी.चरना महेसवा को गौर से देख रहा था,उसे महेसवा के पतले और बीमार रहने का राज पता चल गया था। तभी छुटकी उछलती हुई चरना के गोद में आ बैठी__

" पप्पा लिट्टी खायम.। "

चरना उसके मुंह में लिट्टी डाल रहा था माई पड़ोस में बीमार चाची के घर भी लिट्टी - चोखा पहुंचा आई थी

महेसवा ने चलते हुए कहा_

"कार्तिक पुरनिमा के बाद डिल्ली जायेंगें, तैयार रहना"

"सोच कर बतायेंगें"

चरना के जवाब पर महेसवा को बड़ा आश्चर्य लगा, वह अपने लंबे बाल झटकतें और अधजले सिगरेट को फूंकते-खांसते हुए बाहर निकल गया। सिगरेट के धूंएं से छुटकी को बचाते हुए चरना तेजी से घर के भीतर आया। माई-बापू अपनी अपनी खाट पर दिन भर के अपने-अपने कामकाज की चर्चा में लीन थे, लगता है आज बापू की अच्छी कमाई हुई है.वे कह रहे थे_

"सोबरन के खेत बेचेके है, इ रुपया हम बयाना दे देम...ओकरा में आलु और सब्जी सब रोपल जाइ"

माई की आंखें चमक उठी_" सब छठी माय के किरपा है."

          सोये हुए बिछौतिया को कंबल ओढाते हुए मुनिया चरना को सवालिया नज़रों से देख रही थी। चरना उसकी कजरारे बड़ी आंखों में डूबता हुआ कह रहा था_

" जब खट के ही खाना है तो अप्पन माटी में पसीना मिलायम। मालिक इहां भी है और वहां भी है। लेकिन यहाँ सब सुख-दुख के साथी है...फिर तोर हाथ के रोटी खायल बिना और तोरा आँख से डेरायल बिना हमारा नींद कबहुं आयल है?"

मुनिया शरमा गई। छठी-मैया द्वारा पति की बुद्धि फेरे जाने पर उसका मन श्रद्धा से भर गया। उसने धीरे-से बस इतना कहा_

" कार्तिक पुरनिमा को नरसिंग-स्थान के मेला में केतारी चढ़ाये के गच्छल है, वहां जाइ के है..."

" अरे हां कोनो चिंता ना है...मालिक छठ के कामकाज खातिर बख्सीस दिल खोलके दे हय..."

  तभी, मुनिया बिस्तर के नीचे से कुछ निकालकर चरना के हाथ में धरी। चरना की आँखें चमक उठीं... इ बड़का मोबाइल!!".

"... इ मोबाइल बंबई वाली बड़की-दीदी हमरा देल हथिंन... जब आव हथिंन हमरा ले जरुर कुछ बंबई से ले के आव हथिंन"

चरना मोबाइल में इतराती हुई छुटकी की तस्वीर कैद करने में मशगुल हो गया.....छुटकी मचल कर कह रही थी_" पप्पा, मोबाइल में गाना सुनम..."

     ह्रदय में अपार संतोष लिए मुनिया, सोये हुए बिछौतिया को गर्म-सरसों तेल से मालिश करती बाप-बेटी के नोक-झोंक देख भाव-विभोर हो रही थी और मन ही मन नरसिंग स्थान के मेले में होनेवाले खर्चें का हिसाब लगाने की असफल कोशिश कर रही थी

                 


         



Rate this content
Log in

More hindi story from Pravin Kumar

Similar hindi story from Drama