आशीर्वाद
आशीर्वाद
"मां "ने नीरज को फोन लगाया इतनी देर हो गई कुछ खबर ही नहीं।कैसी तबेत है बहु की ?मां! डॉक्टर जांच कर रहे हैं।
उतने में ही अनिता बाहर आग गई,नीरज को डॉक्टर ने अंदर बुलाया,नीरज ने फोन बंद कर दिया।
जैसे नीरज डॉक्टर से मिलने अंदर गया डॉक्टर ने बैठने के लिए बोला। एक दूसरे चेहरे देख रहे थे।अनिता और नीरज,क्या हुआ ? डॉक्टर ?
डॉक्टर सब ठीक है ना ?
चिंता का कोई कारण नहीं हैं!
फिर ?
अब जिमेदारिया बढ़ गई। मतलब !
आप पिता बनवाले हो।
नीरज का तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
डॉक्टर से पूरी बातचीत हो गई।तुरंत मां को फोन लगाया,मां !हा बोल नीरज !
सब ठीक हे ना हा मां !
बहु कैसी है? डॉक्टर क्या बोल रहे ? मां हमलोग घर के लिए निकल गए।थोड़ी देर में घर पहुंच जायेंगे।
इधर मां की चिंता बढ़ रही थी।क्या हुआ ?थोड़ी देर में अनिता और नीरज घर पहुंच गए।
नीरज क्या बोले डॉक्टर ?सब ठीक हे ना ?चिंता कुछ कारण नहीं ना ?
मां !चिंता कारण कुछ नही अब खुशियों कारण है।
"मां तुम दादी मां,बननेवाली हो।
"मां "ने दोनो हात जोडकर भगवान के सामने बहु के लिए "आशीर्वाद "मांगे।मां आज बहुत खुश थी,
और बहु को बोली !आज से तुम भी खुश रहेना।इस घर के लिए खुशियां जो लाई रही हो।आज से तुम्हारा ध्यान मैं पूरा रखूंगी।
देखते देखते आज चौथा महीना भी खत्म हो गया।
सब कुछ ठीक ही था।
लेकिन अनिता खुश नहीं थी
उसका उदास चेहरा नीरज को परेशान कर रहा था।
क्या हुआ तुम इतनी टेंशन में क्यू हो ?क्या परेशानी है?कुछ बोलो भी। कैसे पता चलेगा ? बोलो।
तब जाकर अनिता बोली। नीरज हमारी शादी अभी पांच महीने ही हुए।
शादी का अभी इतना खर्चा हुआ है। पापा को और दो बेटियों की और जिमेदारि भी है।और सासू मां बोल रही हैं,
गोदभराई रस्मे और डिलेवरी पूरा मायके में ही करना और जो मेहमान आयेंगे उनका मान सम्मान भी करना पड़ेगा। वो अलग खर्चा।कैसे करेंगे पापा अकेले ?यही चिंता हो रही है।कैसे बोझ उठाएंगे ?
अनिता तुम मत चिंता करो। बच्चा हमारा खर्चा भी हम उठाएंगे।पापा क्यू खर्चा उठाएंगे ?
तुम बस अपना ध्यान रखना और खुश रहना। मैं मां से बात करता हु। तुम्हारा खयाल रखना ये भी तो मेरा फर्ज है।
अनिता का चेहरा एकदम से खिल गया जैसे मन की चिंता है दूर हो गई।
और एक महीने के बाद अनिता मायके चली गई।।धूम धाम से गोदभराई रस्मे हो गई।कुछ रस्म रिवाजों में कटौती भी हुई।
इधर मां ने,नीरज से बात की ये क्या तेरे ससुरावालेनो मेहमानों को खाली हात ही लौटाया।हात में कुछ दिया नही। लोग क्या बोलेंगे?
तो क्या हुआ मां ?
मां आप भी आजतक रीति रिवाज निभाती आईए कभी कभी घर खर्चे से कटौती कर तर कभी अपने इच्छाओं को मार कर लेकिन ये सब धीरे धीरे खतम करना है मां!
उपहार का बोझ क्यू?
उपहार मिलने वाली कभी किसी की साड़ी पसंद नही आइ तो किसका रंग तो कुछ काम के भी नही रहते थे। कुछ तो किसी किसी को दे दे थीं। उपहार जरूरी नहीं है, मां !
वैसे भी अनिता के पापा ने शादी में आप कहने से सब मेहमानों का स्वागत और मान पान सन्मान किया हे।
आपके रीति रिवाजों का भी,लेकिन इसे शादी का खर्चा भी तो बढ़ जाता है।
अपनी परंपरा जरूरी है रिवाज भी लेकिन हैसियत जादा नही करना चाहिए।जितनी जरूरत है उतनी।
थोड़ा बदलाव जरूरी है।
सब खुश करना ये खयाल दिल से निकाल दो,
एक नई सोच से सकारात्मक बदल लाओ।
"मां "को थोड़ा बुरा लगा।
की बेटा ससुराल का पक्ष ले रहा है।
मां हमे !उपहार की नही,"आशीर्वाद "जरूरत है।
आशीर्वाद से जैसी बड़ी कोई संपत्ति नहीं है।
आशीर्वाद वरदान है।अक्षय होता है कब जीवन में फलित होगा आशीर्वाद लेने वालोको पता नही चल था।
सच्चे हृदय और प्रसन्न आत्मा से दिया हुआ "आशीर्वाद" फलीभूत होता है।
"आशीर्वाद" किसी लालच के अधीन होकर नही देना चाहिए आशीर्वाद पाने के लिए किसी को किसी प्रकार का" उपहार" देने का कोई औचित्य नहीं है।
"मां" को भी अपने सोच को बदलना पड़ा,
"आशीर्वाद "ही सब से बड़ा उपहार है।"क्यू की दिल से दिया जाता है।
आशीर्वाद और शुभकामनाए, सम्मान,उपहार,उपहार से कहीं अधिक मूल्यवान हैं ! उन्हें भरभर के देना चाहिए।
तृप्ती देव
