आख़िरी मुसाफ़िर
आख़िरी मुसाफ़िर
रात के ठीक दो बज रहे थे। दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड और ऊपर से घना कोहरा, हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। रामगढ़ रेलवे स्टेशन का छोटा सा प्लेटफॉर्म पूरी तरह वीरान पड़ा था। पीले बल्बों की मद्धिम रोशनी में रेलवे ट्रैक किसी सोए हुए अजगर की तरह नज़र आ रहे थे।
स्टेशन मास्टर राघवेंद्र बाबू अपनी केबिन में हीटर के सामने बैठे चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी अचानक एक लंबी सीटी की आवाज़ गूँजी और 'काठगोदाम पैसेंजर' प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक पर आकर रुकी। यह उस स्टेशन पर रुकने वाली रात की आख़िरी ट्रेन थी।
ट्रेन से कोई नहीं उतरा, सिवाय एक बूढ़े आदमी के।
उस आदमी ने मटमैला लंबा कोट पहन रखा था, सिर पर टोपी थी और हाथ में एक पुराना चमड़े का सूटकेस। उसके चलने के अंदाज़ में एक अजीब सी थकावट थी, मानो वह सदियों से सफ़र कर रहा हो। ट्रेन कुछ ही पलों में सीटी बजाती हुई आगे अंधेरे में गुम हो गई।
राघवेंद्र बाबू को थोड़ी हैरानी हुई। इस सुनसान स्टेशन पर इतनी रात को कोई मुसाफ़िर शायद ही कभी उतरता था। वे अपनी केबिन से बाहर निकले। ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका उनके चेहरे से टकराया।
वे उस मुसाफ़िर की तरफ बढ़े और विनम्रता से बोले, "बाबूजी, रात बहुत हो चुकी है। इस वक़्त यहाँ बाहर कोई सवारी या ताँगा नहीं मिलेगा। आप चाहें तो सुबह होने तक वेटिंग रूम में आराम कर सकते हैं।"
बूढ़े आदमी ने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखें बेहद गहरी और शांत थीं, मानो उनमें किसी पुराने तूफ़ान का ठहराव हो। उसने एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "धन्यवाद बेटा, लेकिन मुझे कहीं दूर नहीं जाना। मेरी मंज़िल यही स्टेशन है। मैं यहाँ चालीस साल बाद लौटा हूँ।"
राघवेंद्र बाबू ने उत्सुकता से पूछा, "चालीस साल? क्या आप यहाँ किसी से मिलने आए हैं?"
मुसाफ़िर ने प्लेटफ़ॉर्म के कोने में खड़े पुराने बरगद के पेड़ की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में एक दर्दनाक खनक थी, "हाँ, एक वादे से मिलने आया हूँ। चालीस साल पहले, आज ही की रात, मैंने किसी से कहा था कि मैं इस आख़िरी ट्रेन से लौटूँगा। उस वक़्त मैं अपनी अना और गुस्से में उसे छोड़कर चला गया था। जब तक मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ, ज़िंदगी बहुत आगे निकल चुकी थी। मैं बस देखना चाहता था कि क्या वो बेंच अब भी वहीं है जहाँ हम घंटों बैठा करते थे।"
राघवेंद्र बाबू समझ गए कि बात किसी पुराने अफ़सोस की थी। उन्होंने कहा, "बाबूजी, वक़्त किसी के लिए नहीं रुकता। चालीस साल बहुत लंबा अरसा होता है। अब यहाँ कोई नहीं रहता।"
बूढ़ा आदमी मुस्कुराया, उसकी आँखों में एक आँसू चमक उठा। उसने कहा, "वक़्त नहीं रुकता बेटा, लेकिन कुछ यादें हमेशा वहीं खड़ी रहती हैं जहाँ हम उन्हें छोड़ जाते हैं। आज इस स्टेशन पर कदम रखकर मेरा वो अधूरा सफ़र पूरा हो गया। अब मैं चैन से जा सकता हूँ।"
इतना कहकर वह मुसाफ़िर प्लेटफॉर्म के बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ मुड़ गया।
राघवेंद्र बाबू ने सोचा कि कम से कम उसे एक कप गर्म चाय तो पिला दें। वे पलटे, केबिन से थर्मस उठाया और तुरंत बाहर आए। लेकिन महज़ दस सेकंड में प्लेटफॉर्म पूरी तरह खाली था। कोहरे की चादर के बीच दूर-दूर तक किसी के कदमों के निशान भी नहीं थे। सिर्फ़ बरगद के पेड़ के नीचे वाली पुरानी सीमेंट की बेंच पर एक ताज़ा, लाल गुलाब रखा हुआ था।
राघवेंद्र बाबू सन्न रह गए। उस कंपकपाती ठंड में भी उनके माथे पर पसीना आ गया। उन्हें याद आया कि स्टेशन के रिकॉर्ड के मुताबिक, ठीक चालीस साल पहले आज ही की रात एक ट्रेन हादसे में एक मुसाफ़िर खो गया था, जिसका नाम कभी किसी ने नहीं जाना... वह सिर्फ़ 'आख़िरी मुसाफ़िर' बनकर उस स्टेशन के इतिहास में दर्ज था।
