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Mohd Saleem

Drama


4.9  

Mohd Saleem

Drama


आखिर कब तक

आखिर कब तक

13 mins 954 13 mins 954

ढलती हुई शाम के साथ मौसम ने करवट ली। मौसम की तरह ही मनुष्य के जीवन में भी आँधी, तूफान, बरसात, धूप, छांव का खेल भी चलता रहा। मनुष्य की मनुष्यता वर्तमान समाज में एक विडम्बना का कारण बनी हुई है, जिसकी विसंगति का कारण नाबालिग बाल जीवन बनता है। ऐसे ही एक गाँव में दो बच्चे रहते थे जो मजदूरी करके अपना जीवन गुज़ारते थे। बचपन में ही कूड़ाघर के एक कोने में मिले दोनों मासूम बच्चों को अनाथालय के लोगों ने अपनाया किन्तु अनाथालय के दरिद्र जीवन एवं बुरे व्यवहार से तंग आ कर दोनों वहाँ से भाग निकले। अनाथालय में छोटू छोटी के नाम से पुकारे जाने वाले मासूम बच्चों की अपनी कोई पहचान नहीं थी। धूप, छांव, गर्मी, सर्दी को झेलते हुए दोनों मासूम सड़क पर रहते थे। भूख की जंग और पेट की आग दोनों को काम करने पर मजबूर करती थी। कई दिनों के बाद छोटू को एक मंत्री के घर सफाई का काम मिला जो उसके लिए एक सपने जैसा था। उसकी बहन छोटी एक प्रतिष्ठित एनआरआई के घर में काम करती थी। दोनों का जीवन घोर अंधकार में व्यतीत होता था किन्तु अपने जीवन के इस सत्य को वे जीवन की विडम्बना मान कर जीते थे।

मंत्री के घर सफाई करते हुए छोटू ने देखा एक मजदूर अपने बेटे की नौकरी के सिलसिले में मंत्री जी से सिफ़ारिश कर रहा है।

मजदूर: “नेता जी”, मेरा लड़का मैट्रिक पास है कोई नौकरी का जुगाड़ हो जाये तो.........।

नेता: हाँ, क्यों नहीं। लेकिन बात में वज़न की कमी है, वज़न बढ़ाओ तो बात भी बने।

मजदूर: “नेता जी, मैं ठहरा एक गरीब किसान, मुझ पर तो रहम करिए।

नेता: वज़न के मामले में रहम तो हमने अपने बाप पर भी नहीं की, तू तो फिर भी एक मजदूर है। वज़न बढ़ेगा तभी कुछ हो सकता है, वरना मजदूरी कर जिंदगी भर और अपने बेटे को भी अपना काम सीखा कर मजदूर बना ले।

मजदूर: नेता जी, मजदूरी में जीवन बिता कर हम तो गुजरने वाले हैं लेकिन अपने बच्चों को अपने जैसी जिंदगी नहीं देना चाहते। कुछ कम में बात हो जाए तो........! 

नेता: चल ठीक है। जितने भी तेरी बीवी के घर में गहने बचे हैं, सब ले आ जितना हिसाब बनेगा उतने की नौकरी पक्की।

मजदूर: नेता जी, एक ही बेटी है हमारी उसके ब्याह के लिए रखे हैं। इतना जुल्म न करो हम गरीबों पर। 

नेता: मैंने अपना अंतिम निर्णय बता दिया है, अब बेटे के लिए नौकरी चाहिए तुझे तो यही एक रास्ता है तेरे पास।

मजदूर (रोते हुए): ठीक है नेता जी, भगवान आपका भला करे।

अगले दिन मजदूर पैसे और गहने ले कर नेता के पास आता है और नेता को देता है तभी सामने से नेता जी का असिस्टेंट तेज़ी से दौड़ते हुए कहता है: 

असिस्टेंट: नेता जी, मीडिया वाले आए हैं, ज़रा वज़न संभालिए।

नेता: अरे, इन लोगों को भी अभी आना था। (गहने फिर से मजदूर को देते हुए) तू ये पकड़ कर यहीं बैठ और अपना मुंह बंद रखना।

(मीडिया वालों का प्रवेश)

मीडिया: नेता जी, आपका नाम आज के समय में बहुत प्रतिष्ठित लोगों में आता है। आपने गरीबों के लिए बहुत कुछ किया है। हमारे दर्शक जानना चाहते हैं, रिश्वतखोर नेताओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

नेता: देखिये, हम हमेशा रिश्वत लेने और देने दोनों के विरुद्ध रहे हैं। आजकल के नेता गरीबों का शोषण करते हैं, उन्हें प्रताड़ित करते हैं, उन्हें झांसा दे कर उनके साथ ठगी करते हैं। किन्तु हम ऐसे नेताओं के सख्त विरुद्ध हैं, हम नहीं चाहते कोई गरीब, मजदूर आदि इस शोषण का शिकार बने। 

मीडिया: (मजदूर को बैठे देख कर) नेता जी, ये मजदूर क्या ले कर बैठा है आपके सामने?

नेता: वो, वो....! अरे ये हमारा प्रिय है इसको आवश्यकता थी कुछ पैसों की तो हमने इसकी सहायता के लिए इसे कुछ पैसे दिये हैं, जिससे इसकी समस्याओं का समाधान हो सके। (नेता मजदूर की ओर देखते हुए) रामू तू जा और इन पैसो से अपना घर बना, अपनी बेटी की शादी कर। (मीडिया की ओर देखते हुए) बेचारा बहुत गरीब है इसकी सहायता के लिए हमने इसे दान दिया है। जा रामू अपना काम कर तेरा सब काम हो जाएगा इनसे।

मजदूर: जैसी आपकी इच्छा नेता जी।

(रामू जाता है)

मीडिया: वाह नेता जी! आपके जैसे नेताओं की ही देश को आवश्यकता है। ऐसे सभी गरीबों को दान दे कर आप गरीबों पर उपकार करें। 

अच्छा नेता जी, देश में बाल मजदूरी बढ़ने लगी है, इस संदर्भ में आपके क्या विचार हैं? बाल मजदूरी को कैसे रोका जाए?

नेता: देखिये, बाल मजदूरी आज के समय की जटिल समस्याओं में से एक है। छोटे-छोटे बच्चों से लोग काम कराते हैं उनका जीवन बर्बाद करते हैं। उनका शारीरिक एवं मानसिक शोषण करते हैं। ऐसे लोगों का मुंह काला कर के गधे पर बैठा कर पूरे देश घुमाना चाहिए, उनको सही सबक सिखाया जाना चाहिए ताकि वे ऐसा करने से पूर्व सोचें।

इसी बीच छोटू चाय का कप ले कर आता है।

छोटू: नेता जी चाय। 

मीडिया नेता को देखते रहती है। 

मीडिया: नेता जी, ये कौन है ?

नेता: पता नहीं ये कहाँ से आया। लगता है विपक्ष की साजिश है ये कोई जो इस बच्चे को यहाँ भेजा। हम इसे नहीं जानते, आप हमारा विश्वास कीजिये हमने भी इसे अभी देखा है। (नेता रामू से) ओए लड़के मैं जनता हूँ विपक्ष ने हमें बदनाम करने के लिए तुझे यहाँ भेजा है। चल निकाल यहाँ से। (छोटू जाता है)

मीडिया: ठीक है नेता जी, हमें अपने सभी प्रश्नों के जवाब मिल चुके हैं अब हम चलते हैं।

नेता: जी अवश्य। किन्तु विपक्ष की ऐसी चाल से हम घबराएँगे नहीं हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे।

(मीडिया जाती है। नेता छोटू को बुलाता है)

नेता: (छोटू को थप्पड़ मारता है) ओए तुझे बीच में आने के लिए किसने कहा था। आज तेरी वजह से मेरी कुर्सी हिल जाती। (असिस्टेंट से) इसे अभी लात मार कर बाहर निकालो और आज के बाद ये आस-पास भी दिखना नहीं चाहिए।

छोटू रोता हुआ अपनी किस्मत को कोसता हुआ वहाँ से निकाल जाता है।

छोटू: ये नौकरी भी गई, अब हमें आज का खाना कैसे मिलेगा? छोटी भी भूखी होगी। 

छोटू को सामने कुछ लड़के जूते साफ करते हुए दिखाई देते हैं। वह उनके पास जाता है और उनसे पूछता है।

छोटू: भैया! मुझे भी कोई काम दे दो? मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे पास खाने के भी पैसे नहीं है। आप जो भी काम दोगे मैं वो कर लूँगा।

मोची: अच्छा! हाँ दिखने में तो तू बहुत गरीब है। चल ठीक है। (सामने कमरे की ओर इशारा करते हुए) वहाँ से एक सेट ले आ और जूते साफ करना शुरू कर और हाँ ध्यान रख 10 रुपये से कम किसी से न लेना वरना तेरे पैसे काट लूँगा।

छोटू जूते साफ करने के लिए बैठता है। एक-एक कर के ग्राहक आना शुरू होते हैं लेकिन सभी उसे 5 रुपये दे कर जाते हैं। उसके निवेदन करने पर भी कोई उसे 10 रुपये नहीं देता। वह उदास हो कर यही सोचता है कि अब वह किस तरह मोची को बताए कि ग्राहकों ने उसके साथ ऐसा किया। संध्या होते ही वह हिम्मत कर के मोची के पास जाता है। उसे दिन-भर की कमाई के पैसे देता है।

मोची: बस इतनी सी कमाई की तूने आज? पूरे दिन में मैं 200 रुपये तक कमा लेता हूँ और तू सिर्फ 50 रुपये लाया है? सच-सच बता कहाँ खाये तूने पैसे?

छोटू: (हाथ जोड़ कर सहमे हुए) मेरे मांगने पर भी लोगों ने मुझे सिर्फ 5 रुपये ही दिये। मैंने कोई चोरी नहीं की न ही पैसे खाये। मैं गरीब हूँ भैया लेकिन धोखेबाज़ और झूठा नहीं।

मोची: (लात मारते हुए) हरामी मुझसे झूठ बोलता है। निकाल यहाँ से और आस-पास भी दिखा गया कल से तो जान से मार दूंगा।

छोटू: (रोते हुए) भैया मैं सच कह रहा हूँ। मेरी कोई गलती नहीं है। मेरी दिन की कमाई दे दीजिये?

मोची: अबे जा! मेरी कमाई के पैसे हैं ये तू जा यहाँ से।

मोची उसके सारे पैसे ले कर उसे निकाल देता है। छोटू रोता हुआ सोचता है अब रात होने को है छोटी भी आने वाली होगी, लेकिन खाने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं है। कुछ बचे हुए रुपयों से वह होटल के कर्मचारी से बचा हुआ खाना मांगता है। उन पैसों से वह फेंका जाने वाला खाना ले कर अपने उस घर की ओर प्रस्थान करता है जहां से लोग केवल कुछ क्षण के लिए आते हैं- फुटपाथ।

एक प्रतिष्ठित एनआरआई के घर में छोटू की बहन छोटी सफाई का काम करती है। सफाई करते हुए छोटी को कुछ किताबें, चौक-स्लेट और एक जूतों का जोड़ा रखा दिखाई देता है। जूते मालकिन की बेटी के होते हैं जो मालकिन अपनी प्रतिष्ठा दिखाने के लिए महंगे बाज़ार से लाई है। छोटी वह किताबें हाथ में ले कर पढ़ने का प्रयास करती है और जूते पहनने की कोशिश करती है, तभी मालकिन उसे देख कर तुरंत धकेलती है और थप्पड़ मारते हुए कहती है।

मालकिन: कमीनी, तुझे यहाँ काम करने के लिए रखा है या जूते चुराने के लिए। मेरी बेटी के इतने महंगे जूते चुरा रही थी। और किताबों का मतलब भी पता है तुझे, जो उठा कर देख रही थी? 

छोटी: (रोते हुए) मालकिन! मैं कुछ नहीं चुरा रही थी। मैं तो बस देख रही थी। 

मालकिन: मुझसे ज़बान लड़ाती है। (एक और थप्पड़ मारती है) काम करना है तो कर वरना निकाल जा यहाँ से।

छोटी रोते हुए वहाँ से निकल जाती है। और फुटपाथ पर अपने भाई छोटू का इंतज़ार करती है। छोटू भी तभी आ जाता है। छोटी उसे मालकिन के घर हुई घटना बताती है, जिसे सुन कर छोटू को बहुत दुख होता है। छोटी के मन में कई प्रश्न जन्म लेते हैं जो वह छोटू से करती है।

छोटी: भैया! ये गरीब क्या होता है? हम गरीब क्यों हैं?

छोटू: बहना! जो अनाथ होता है वो गरीब होता है। हम अनाथ हैं इसलिए गरीब हैं। अगर हमारे भी माता-पिता होते तो आज हमारे पास भी सब होता।

छोटी: भैया! क्या गरीबों के पैर नहीं होते जो लोग हमें जूते पहनने तक नहीं देते ?

छोटू: तुम परेशान न हो, हमारा जीवन ही ऐसा है।

छोटी: हमारा जीवन ऐसा क्यों है भैया? हम सड़क पर क्यों रहते हैं, हमार कोई घर क्यों नहीं है ?

छोटू: बेटा! हमेशा याद रखना 

धरती हमारा घर, आसमान हमारी छत,

कभी न हमको रोना है, हमें यहीं पे सोना है।

छोटी: अच्छा भैया! लोग कहते हैं पढ़ने-लिखने से हम बड़े बन जाते हैं मालकिन जैसे। मुझे भी पढ़ाओ ना, मैं भी मालकिन जैसे अच्छे कपड़े पहनना चाहती हूँ और घर में रहना चाहती हूँ।

छोटू: अच्छा! मेरी छोटी पढ़ना चाहती है। चल ठीक है! मैं तेरे लिए कल कुछ पढ़ने के सामान ले आऊँगा और तेरा दाखिला भी अच्छे स्कूल में कराऊंगा। फिर तू खूब मन लगा कर पढ़ना और आगे बढ़ना।

छोटी अपने भाई छोटू को गले लगा लेती है और उस झूठन को खा कर खुशी से बड़े ख्वाब देखते हुए सो जाती है। छोटू इसी सोच में सो नहीं पाता कि वे किस तरह अपनी बहन का दाखिला कराएगा और उसे पढ़ाएगा, क्योंकि उसके पास करने के लिए कोई काम नहीं था।

अगले दिन छोटू काम की खोज में फिर से लग जाता है, राह में चलते हुए उसे एक कूड़ेदान दिखाई देता है जहां कुछ व्यक्ति कूड़ा डाल रहे होते हैं। छोटू उस कूड़ेदान के पास जाकर उनसे पूछता है।

छोटू: साहब! आपके पास कोई काम मिलेगा? मुझे भी काम करना है, मेरे पास पैसे नहीं है।

व्यक्ति 1: तू क्या काम करेगा?

व्यक्ति 2: तेरी हालत देख कर लगता नहीं है, तू हमारा काम कभी कर पाएगा।

व्यक्ति 3: हाँ! तेरे लिए यहाँ कोई काम नहीं है। शक्ल से तू वैसे भी भिखारी लग रहा है जा कहीं जा कर भीख मांग। भिखारी कहीं का।

तीनों व्यक्ति उसका उपहास कर उस पर हँसते हैं।

छोटू: साहब! मैं आपसे काम की भीख मांगता हूँ। आप जो भी काम देंगे वो मैं करूंगा। आप कोई भी काम दे दीजिये। मुझे मेरी बहन को भी पालना है, मुझ पर दया करें।

व्यक्ति 1: चल ठीक है। घरों से कूड़ा उठा कर यहाँ डालने का काम देते हैं तुझे। यहाँ जितने भी मकान हैं सभी का कूड़ा इस थैले में डाल कर ले आ। हम दिन क 40 रुपये देंगे। 

व्यक्ति 2: (थैला बढ़ाते हुए) अगर करना है तो अभी से काम पर लग जा।

छोटू: ठीक है साहब। आप सभी का धन्यवाद।

मोहल्ले के सभी मकानों का कूड़ा इकट्ठा कर कूड़ेदान में डालने का काम करते हुए छोटू को सभी लोगों के उपहास और तानों का सामना करना पड़ता है। किसी तरह काम पूरा करने पर 40 रुपये देहाड़ी कमाता है। उसे याद आता है कि उसकी बहन ने उससे पढ़ाई के सामान की ज़िद की थी। वह तुरंत दुकान जा पहुंचता है और दुकानदार से पूछता है।

छोटू: साहब! मुझे अपनी बहन को पढ़ाना है, जिसके लिए कुछ चीजों की ज़रूरत है वो दे दीजिये?

दुकानदार: तू वही है न जो अपनी बहन के साथ फुटपाथ पर रहता है?

छोटू: हाँ साहब! 

दुकानदार: अबे तू क्या पढ़ाएगा भिखारी कहीं का! और तेरी बहन को तो चूल्हा ही फूंकना है वो पढ़ कर क्या करेगी? वैसे भी तुम जैसे गंदी नाली के कीड़े ऐसे फुटपाथ के ही लायक हैं।

छोटू: साहब मैं भिखारी नहीं हूँ। मेरी बहन पढ़ना चाहती है, आगे बढ़ना चाहती है, आपकी बड़ी महरबानी होगी, मुझे सामान दे दीजिये? मेरे पास पैसे भी हैं।

दुकानदार: अच्छा ठीक है। ये ले कॉपी-पेंसिल और कुछ किताबें। सब का 50 रुपया हुआ।

छोटू: साहब मेरे पास तो सिर्फ 40 रुपये हैं। ये ले लीजिये बाकी पैसे मैं आपको कल लौटा दूँगा। मैं यही पास में कूड़ा फेंकने का काम करता हूँ। मैं कल किसी भी तरह बाकी पैसे लौटा दूँगा और अगर नहीं लौटा पाया तो आपकी मजदूरी कर लूँगा। कृपा करके दे दीजिये।

दुकानदार: तुझे देख कर लगता तो नहीं है तू पैसे लौटाएगा, लेकिन तू इतनी भीख मांग रहा है तो ठीक है ले जा 40 में, लेकिन कल तक मुझे बाकी पैसे दे जाना। वरना तेरे इलाके में घुस कर ले जाऊंगा।

छोटू: धन्यवाद साहब! कल आपके पैसे लौटा दूँगा। भगवान आपका भला करे।

किसी तरह पढ़ाई के सामान का इंतजाम कर छोटू खुश भी होता है और दुखी भी, कि उसके जन्म से लेकर अब तक उसे सिवाए अवहेलना और तानों के कुछ नहीं मिला। उसके मन में कई सवाल है, कि उसकी ऐसी क्या गलती है कि वो अनाथ है और उसका जीवन इतनी दरिद्रता से ग्रसित है। संध्या होने को थी कि उसके मन में अब एक ही सवाल था सारे पैसे तो खर्च हो गए आज खाने का इंतजाम कैसे होगा? वह तो किसी तरह भूखा रह भी लेगा किन्तु छोटी को वो भूखा कैसे देख पाएगा? इसी व्यथा में उसे वही कूड़ेदान दिखाई देता है जहां उसने कूड़ा फेंका था। उसे उस कूड़ेदान में पड़ी हुई कुछ खाने की वस्तुएँ दिखाई देती हैं। वह उनको ही उठा कर चल देता है।

फुटपाथ पर पहुँच कर अपनी बहन का इंतज़ार करता है और मन ही मन खुश होता है कि उसने किसी तरह अपनी बहन के लिए पढ़ाई के सामान का इंतजाम तो कर दिया है अब उसका भविष्य अच्छा होगा। कूड़ेदान से लाये हुए खाने को खा कर वह वहीं अपनी बहन के इंतज़ार में लेट जाता है। कुछ समय के बाद छोटी भी आ पहुँचती है। उसकी नज़रें उन सामानों पर जाती है जो उसका भाई उसकी पढ़ाई के लिए लाता है। वह मन ही मन बहुत खुश होती है उसका मन होता है कि अपने भाई को गले लगा ले, किन्तु अपने भाई को सोता देख सोचती है कि आज भैया बहुत थक गए हैं उनको उठाना ठीक नहीं और बचा हुआ खाना खा कर उसके साथ ही लेट जाती है।

धरती हमारा घर, आसमान हमारी छत, कभी न हमको रोना है, हमें यहीं पे सोना है।

(अगले दिन मीडिया का आगमन)

मीडिया: जैसा कि आप देख सकते हैं, दो मासूम बच्चे जो फुटपाथ पर जीवन बिताते थे, उनकी कल रात जहरीला खाना खाने के कारण मौत हो गई। सूत्रों के मुताबिक, यह बच्चे इसी फुटपाथ पर रहते था और बाल मजदूरी कर अपना जीवन बिता रहे थे। मौका-ए-वारदात से कुछ पढ़ने लिखने के सामान बरामद हुए हैं, जिससे यह लगता है कि यह नाबालिग मासूम पढ़ना चाहते थे, लेकिन खाने की तलाश में कूड़ेदान के किसी जहरीले खाने के सेवन से यह मौत कि भेंट चढ़ गए। मंत्री जी ने इस पर निंदा प्रकट की है और कहा है यह विपक्ष के ही लोग हैं जो ये सब करवा रहे हैं। सभी दलों के नेताओं ने इस पर अपने मत प्रकट किए हैं। किन्तु इन निंदाओं से उन मासूम बच्चों का जीवन वापस आना असंभव है।

आज के समय में न जाने कितने बच्चे बाल मजदूरी का शिकार हो रहे हैं। कितने ही आज भी बाल मज़दूरी कर जीवन बिता रहे हैं। आखिर कब तक इसी प्रकार मासूमों का शोषण किया जाएगा? आखिर कब तक इन बच्चों का जीवन इसी प्रकार अवसाद और दरिद्रता में व्यतीत होगा? आखिर कब तक नेता इसे विपक्ष की चाल तक ही सीमित रखेंगे और केवल निंदा ही करते रहेंगे ? इन्हीं सवालों के साथ हम मिलते हैं आपसे अन्य खबरों के साथ आपके अपने चैनल पर जिसका नाम है कब तक ?


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