आख़री चाय
आख़री चाय
बड़ी मुश्किल से 1 हफ्ता तत्काल टिकट देखने के बाद पुणे से नागपुर तक का ही टिकट मिल पाया।
फिर मैंने तय किया कि चलो इस बार नागपुर से रायपुर का सफर सड़क मार्ग से ही तय कर लेंगे।
लगभग 9:45 बजे सवेरे ट्रेन नागपुर पहुँची। नाश्ता करके मैंने कार में सफर शुरू किया।
लगभग 2:30 बजे जब कार भिलाई नगर पार करने लगी तो मुझे वो चाय की टपरी दिखी जहाँ मैं,जतिन,निशांत और तुषार अक्सर कॉलेज के दिनों में चाय पीने जाया करते थे।
मैंने ड्राइवर से गाड़ी वहीं रोकने को कहा।
मैं उतरा तो मैंने देखा कि वहाँ पर कोई न था। । । लगभग 10 मिनट बाद वो काका दिखे जिनकी चाय के हम दीवाने थे।
उन्होंने कहा अरे बेटा विशाल तुम आ गए। बस तुम्हारा ही इंतज़ार हो रहा था और उनके इतना कहते ही जतिन,निशांत और तुषार भी वहाँ आ गए।
पुराने दोस्तों से मिलकर ख़ुशी का ठिकाना ही न रहा, आँखों में आँसू भी थे, लड़खड़ाते लबों को कहना भी बहुत कुछ था पर कहाँ से शुरू करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था।
तब तक तुषार ने कहा और भाई विशाल हफ्ते भर से तेरा ही इंतज़ार कर रहे थे, मुझे कुछ ठीक से समझ नहीं आया और इससे पहले कि मैं कुछ कहता निशांत ने कहा कि काका 4 चाय बना दो फिर चलते हैं।
मैंने पूछा कहाँ चलते हैं, उसने कहा कि काका एक नयी जगह शिफ्ट हुए हैं बस वहीं।
मुझे लगा कि शायद काका ने कोई नयी दुकान ली होगी।
ऐसे ही कुछ बातें चल रही थी और तब तक जतिन ने कहा कि भाई विशाल हम तीनो 5 मिनट में आते हैं तू रुक यहीं और चले गए।
मैं मन में मुस्कुराया कि हर बार कि तरह पैसे न देने पड़े इसलिए चले गए, लेकिन मैं इतना खुश था कि आज मैं अपने दोस्तों से मिला, चाय तो क्या ये आज कितना भी पैसा खर्चा करवायें गम नहीं।
और इस बीच काका भी बोले कि बेटा मैं आता हूँ और चले गए।
लगभग 20 मिनट बाद भी कोई वापस नहीं आया तो चिंता हुई, तब तक एक 17-18 साल का लड़का उस टपरी पर आया, शायद काका का बेटा था, जब हम कॉलेज में थे तो स्कूल जाता था वो।
मैंने उससे पूछ कि काका कहाँ गए और जतिन,निशांत और तुषार वो थे वो भी नहीं दिख रहे।
इतना सुनते ही उसके आँखों से आँसू छलक पड़े और उसने एक न्यूज़ पेपर कि कटिंग दिखाई।
उसे पढ़कर मैं स्तब्ध रह गया, खबर थी " भिलाई मार्ग पर सड़क हादसे में वृद्ध सहित 3 युवकों की मौत"
उस लड़के ने बताया कि जतिन,निशांत और तुषार ने काका के लिए नयी दुकान खोजी थी और 1 हफ्ते पहले उन्हें वहीं जगह दिखने जा रहे थे और उन्होंने कहा था कि विशाल को भी उसके उट्घाटन में बुलाएँगे और तभी ये सब हो गया।
ये सब सुनकर मैं एक मूर्ती सा वहीं कुर्सी पर बैठा रह गया, सैकड़ों सवाल मन में कोलाहल करने लगे।
ये मन खुद को धिक्कार रहा था कि पैसे कमाने के चक्कर में किस तरह अपने पुराने दोस्तों रिश्तों को मैं भूल गया था और वो तीनो अपना फ़र्ज़ निभा रहे थे।
उन्होंने तो अपना फ़र्ज़ मरकर भी निभाया और मेरा इंतज़ार किया।
एक ग्लानि से भरे व्यथित मन से मैंने उस काका के बेटे से पूछा कि ये और लोग जो चाय पीने आ रहे हैं सामने कि तीन कुरसिययों पर क्यों नहीं बैठ रहे।
उसने उत्तर दिया कि आपने शयद बोर्ड पर ध्यान नहीं दिया, ये उन तीनो कि याद में है और यहाँ कोई नहीं बैठता। ये उनकी जगह थी। पर मुझे कुछ भी नहीं दिख रहा था।
मैं आँखों में आँसू लिए कार कि तरफ चल पड़ा, मुझे उस सड़क से अब आगे का सफर तय करना था जहाँ पर उन्होंने अपना सफर ख़त्म किया।
मैंने फिर एक बार मुड़कर उन कुर्सियों को देखना चाहा और मुझे कुछ ऐसा दिखा जो शयद सिर्फ मेरे लिए था।
वहाँ लिखा था।
"आखरी चाय के लिए धन्यावद विशाल,तू हमेशा खुश रहे"
