वसुधैव कुटुंबकम्
वसुधैव कुटुंबकम्
एक दिन जब सवेरे सवेरे
प्रदूषण की चादर हटा के
एक ऊंची इमारत की
आड़ से सूरज ने देखा,
तो नजर आया के हर घर की,
इमारतों, गलियों, मोहल्लों की वादियों में
वसुधैव कुटुंबकम् का मौसम छाया हुआ है
और रास्तों, स्टेशन, बस स्टॉप की डालियों पर
अनगिनत बीते हुए लम्हों की
कलियां महकने लगी है।
अनौपचारिक, अधुरी सी बातें,
कुछ Whatsapp पे की हुई
कुछ फेसबुक पे की हुई
आंखे मलते हुए अब पूछती है ये ज़िन्दगी,
कुछ खबर रिश्तेदारों की, दोस्तों की ?
हां वही जिंदगी है ये,
जो त्योहारों पर और किसी के
बीमार होने पर एक साथ आती है।
हां वही जिंदगी है ये,
जो ट्रॅफिक, बारिश, ट्रेन की भीड़ को
पार कर ऑफिस जाती है।
हां वही ज़िन्दगी है ये, जो भूल चुकी थी की,
जिसके दामन में मोहब्बत भी,
कई हसरतें भी है ,
रूठना और मनाना भी।
पास आना भी है, दूर जाना भी है
और अब ये एहसास है ,
वक्त जा रहा है ये कहता हुआ,
जा रहा है नदी सा बैहता हुआ।
घर की वादियों में वसुधैव कुटुंबकम् का मौसम है,
और ये दीवारों की डालियों पर अनगिनत
बीते लम्हों की कलियां महकने लगी है।
