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Satya Prakash Sharma 'सत्य'

Abstract

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Satya Prakash Sharma 'सत्य'

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वो गया साथ लेकर गया कुछ

वो गया साथ लेकर गया कुछ

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वो गया साथ लेकर गया कुछ नहीं

किन्तु लगता यही अब रहा कुछ नहीं


नींद - सपने सभी वो चुरा ले गया,

आँख में आँसुओं के सिवा कुछ नहीं


आज उसका हमें एक ख़त तो मिला,

आँसुओं के निशां थे लिखा कुछ नहीं


रोग ऐसा लगा उम्र भर के लिए,

हर दुआ बेअसर है दवा कुछ नहीं


कुछ कमी भी नहीं एक उसके सिवा,

वो नहीं मिल सका तो मिला कुछ नहीं


जब मिला बस उसे देखते रह गए,

लब हिले तो सही पर कहा कुछ नहीं


रोज जीता रहा रोज मरता रहा,

'सत्य' ऐसे जिया तो जिया कुछ नहीं।


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