STORYMIRROR

Amol Kamble

Abstract

3  

Amol Kamble

Abstract

वैश्या

वैश्या

1 min
541


सम्मान से जब लोगो के सामने झुकाया अपना सिर 

शर्म की गरिमा त्याग कर फिर भी उन्होने बेचा मेरा शरीर


कुदरत की एक पहचान थी मिला था स्त्री का अदभूत रूप 

कभी सोचा न था उसी पहचान से भागना पड़ेगा डर स्वरूप



जखम से भरा था शरीर का हर एक हिस्सा 

कैसे सुनाती अपना ये दुखभरा किस्सा



खेलने कुदने के दिनो में मेरे सपनो के हुए टुकड़े

उम्र भी नहीं थी तब भी फटते रहे मेरे कपडे



समुंदर के किनारो में लहरों की मंजिल हर बार दिखाई पड़ती है 

हर बार नये साहिल तक पहुँचें से पहले अपना रास्ता बदल लेती है



घाबराया था मन उस में काफी यादे छुपी थी 

लेकिन दुनिया के बिस्तर पर तो हर रात मेरे जखमों की ही सज़ी थी



दुनिया ने तो वैश्या जैसे शब्द से हमें पुकारा 

हर बार नारी के ऐसे सम्मान ने हमें सपने में भी झंझारा





विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Amol Kamble

Similar hindi poem from Abstract