तुम कैसे मित्र हो
तुम कैसे मित्र हो
मुझे पता नहीं था पहले
कि तुम कैसे मित्र हो।।
सुगंध ही नहीं जिसमें
तो तुम कैसे इत्र हो।।
मैत्रि के नाम पर तुमने
धोखा दिया पल - पल।।
भोले बनकर तुम यूं
सदााही करते आए छल।।
करने मे बर्बाद मुझे यूं
तुम आ ही गए अव्वल।।
आवारा ने देेखा रंगहीन
तो तुम कैसे चित्र हो।।
मुझे पता नहीं था पहले
की तुम कैसे मित्र हो।
