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Hitesh Awara

Abstract

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Hitesh Awara

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तुम कैसे मित्र हो

तुम कैसे मित्र हो

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मुझे पता नहीं था पहले 

कि तुम कैसे मित्र हो।। 


सुगंध ही नहीं जिसमें 

तो तुम कैसे इत्र हो।।


मैत्रि के नाम पर तुमने 

धोखा दिया पल - पल।।


भोले बनकर तुम यूं

सदााही करते आए छल।।


करने मे बर्बाद मुझे यूं

तुम आ ही गए अव्वल।।


आवारा ने देेखा रंगहीन 

तो तुम कैसे चित्र हो।।


मुझे पता नहीं था पहले 

की तुम कैसे मित्र हो।


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