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rinkal Chauhan

Abstract

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rinkal Chauhan

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तो फिर आज इतनी परेशान क्यों ?

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों ?

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कभी पढ़कर भी नहीं समझ पाती हैं पर 

ढूंढकर किताब सब कुछ बोल जाती हैं 

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों। 


रिश्ते समझने में कच्चे जरूर हैं पर 

परखने ने में आज भी उतने सच्चे हैं 

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों।


मंजिल चल रही रास्ता थक गया हैं पर 

पैरो से बेड़ियां तोड़कर दौड़ने वाली हैं 

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों। 


पेड़ के सूखे पत्ते की तरह खामोश हैं पर 

समंदर की लहरों की तरह झूम उठती हैं 

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों।


बोलना तो हैं पर कोई लब्ज़ नहीं हैं पर 

चुटकियों में इतना सब लिख दिया हैं 

तो फिर आज इतनी परेशान क्यों।


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