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Antra Bajpai

Abstract

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Antra Bajpai

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तेरा साथ

तेरा साथ

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कंपकंपाती पैरों की जमी के साथ

कभी तेरा साथ पाने को जिये हम।

कभी तपती हुई जमी में,

तेरे साथ रहने को चले हम।


कभी बारिश में भीगे तुझे,

महसूस करने भर को।

कभी बारिश में ही रहे

तेरा हाथ छूने को।


कभी उड़ती धूल में,

आँखे गड़ाये रहे।

कभी आंधी तूफान में भी,

पलकें बिछाए रहे,

दीदार तेरा होने को।


क्या अब भी है कुछ!

पास मेरे देने को ?

शायद बारिश ही बची थी,

या नमी कहो आँखों की।


उनको भी जुदा कर दिया

ग़म में तेरे होने को।

अब धड़कन का हाल

क्या जानोगे !

सच भी तो न मानोगे।


तेरी चोट से सीने में

दिल भी नहीं रहा,

तो धड़कन ही क्यों रखें

तड़पने को ?


तुम तो रुला भी सकते हो

हम तो सता भी नहीं सकते

किसी अपने को।


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