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Naman Sharma

Abstract

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Naman Sharma

Abstract

सुनो माँ...

सुनो माँ...

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सुनो ना माँ, सुनो ना

क्यू जन्म दिया तुमने मुझे इस दुनिया में,

क्या पता नहीं था तुझे तेरे ही अपनो का


क्यूँ रोज़ा रखा तूने लड़की पाने का,

क्या पता नहीं था तुझे,

इंसानों के रूप में रह रहे जानवरो का


माँ, रिश्तेदारों के घर पर आने पर,

में भी भाई सा ख़ुश होना चाहती हूँ,

छोड़ सारे काम में भी

उनके साथ खेलना चाहती हूँ


में भी चाहती हूँ उनकी गोदी में

जाके वो चोक्लेट ले आऊँ,

जाने पर उनके थोड़ा अपने

कमरे में बैठ के मायूस हो जाऊँ


पर डर लगता है माँ,

मुझको डर लगता है

तेरे अपने ही तेरी छोटी सी बेटी को

गोद में लेके छेड़ा करते हैं,


अभी तो कमज़ोर ही है मेरे अंग पर

ये उन पर अपने नाखूनों को गोदा करते हैं

कह ना पाती तुझसे कुछ में, इतना डर जाती हूँ,

इंसानों के बीच में जाने से में कतराती हूँ


हर पल में ये सोचा करती हूँ,

क्यूँ भाई जैसा ना बनाया

भगवान ने मुझको लड़का,

क्यूँ दिया ऐसा शरीर जिससे

माँ रहे सहमा सा।


क्या मिलता है इन लोगों को

ऐसे हमें परेशान करके,

क्या ना अपनी इन गंदी नज़रों को

रख आते ये अपने घर पे


मैं सोचती हूँ कि इनकी भी

तो कोई बेटी होगी,

वो भी तो किसी और के

साथ ऐसा करने पर रोती होगी


वो भी तो थोड़ी डरी

सहमी सी रहती होगी,

अपनी डायरी कि पन्नों पर

अपनी माँ कि लिए

ऐसा कुछ लिखा करती होगी


यूँ समाज लड़कों को

सुधारना नहीं सिखाता,

क्यू इंसानियत का एक हिस्सा भी

लोगों में नज़र नहीं आता


क्यूँ रावण से भी नीचे

गिर जाते हैं लोग,

क्यूँ हर बेटी को

सीता सा भी देख ना पाते लोग।


रावण ने तो सीता को

स्पर्श भी नहीं किया था,

पर उसके पाप पर भी

राम ने उसे मृत्यु दंड दिया था


फिर भी अपने पापों को

क्यूँ नहीं पहचान पाते लोग,

क्यूँ नहीं डरते वो राम से,

और काम ऐसे किए जाते है लोग


मेरी उम्र की बच्ची

जब ऐसा झेला करती है,

तो सोचो उम्र कि साथ कितना

कुछ हमारे साथ होता होगा

भगवान भी आज इन लोगों को

बना ख़ुद अकेले में रोता होगा


अरे माँ,

इन बेटों को सिखाओ की

लड़की कोई खिलों नहीं है,

वो नदी नहीं है कोई,

उसमें हाथ धोना नहीं है


कभी सुना है तुमने किसी

औरत को २ महीने के

लड़के का रेप करते हुए,

तो क्यूँ लड़के ऐसा करते है

क्यूँ रहते नहीं ये चैन से,

और ना हमें रहने देते हैं।

डर लगता है माँ, डर लगता है !


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