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Sushila Gabhale

Abstract

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Sushila Gabhale

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स्नेह निर्झर बह गया है

स्नेह निर्झर बह गया है

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स्नेह निर्झर बह गया है। रेत ज्यों तन रह गया है।


आम की यह डाल जो सूखी दिखी, कह रही है-

“अब यहाँ पिक आ शिखी नहीं आते, पंक्ति मैं वह हूँ लिखी नहीं जिसका अर्थ -

जीवन दह गया है।”


“दिये हैं मैंने जगत को फूल-फल, किया है अपनी प्रभा से चकित-चल; पर अनश्वर या सकल पल्लवित पल ठाठ जीवन का वही


अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा, श्याम तृण पर बैठने को, निरुपमा । बह रही है हृदय पर केवल अमा; मैं अलक्षित हूँ, यही।


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