स्नेह निर्झर बह गया है
स्नेह निर्झर बह गया है
स्नेह निर्झर बह गया है। रेत ज्यों तन रह गया है।
आम की यह डाल जो सूखी दिखी, कह रही है-
“अब यहाँ पिक आ शिखी नहीं आते, पंक्ति मैं वह हूँ लिखी नहीं जिसका अर्थ -
जीवन दह गया है।”
“दिये हैं मैंने जगत को फूल-फल, किया है अपनी प्रभा से चकित-चल; पर अनश्वर या सकल पल्लवित पल ठाठ जीवन का वही
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा, श्याम तृण पर बैठने को, निरुपमा । बह रही है हृदय पर केवल अमा; मैं अलक्षित हूँ, यही।
