संभा
संभा
नाम संभाजी उसका
वो शेर शिवा का छावा था
बचपन से ही नीयति ने जिसपे
बोला अपना धावा था
मां की ममता छीन गई
जब मा को भी ना देखा था
जीते जी ही पिंड दान हुआ
जीना अभि तो सिखा था
इतने जख्म सहकर भी
संभा पत्थर खनकर थे
इतिहास में सबसे ज्यादा जिनपे
क्रूरता की हद्द पार हुई
खाल उधेड़ी आंखें फोड़ी
उखाड़े नाखून औरंग ने
किस मिट्ठी से बना है संभा
औरंग उनसे पूछे है
हाथ मिलालो हमसे
छोड़ दूंगा संभा तुझे
बस धर्म ही बदलना होगा
सुन दहाड़ लगाई संभा ने
ये तो होने से रहा
तू मिला हाथ हमसे औरंग
धर्म नहीं बदलना होगा
सुन औरंग ने ये हुकुम किया
काटो जबान काफिर की
लब्ज़ उसके चुभते हे
मानो खंजर माफीक
काटी गई जबान
फिर भी संभा धीट थे
देख नजारा औरंग ने
फिर आखरी वार किया
40 दिन की क्रूरता का
आखिर कार अंत हुआ
सर हुआ कलम, फिर भी
औरंग संभाजी से हार गया
मौत का अपने जश्न मना कर
संभा स्वर्ग सिधार गया
