रिश्ते-नाते
रिश्ते-नाते
(चाल: मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया)
जिंदगी के हर मोड पे मैं रिश्ते जोडता चला गया !
विरासतमे मिलें नाते तोडता चला गया !
प्यार और सोच की हरदम चर्चा हो वहाँ !
उम्र र्और दौलत मे फर्क न महसुस हो जहाँ !
ऐसे लोगो के साथ जुड़ता चला गया
जुडता चला गया, जुड़ता चला गया
जात पात की दिवार ना हो जहाँ !
उंच नीच का ना भेद हो जहाँ !
ऊन लोगो की ओर मुडता चला गया
मुडता चला गया, मुडता चला गया
लेनदेन, संकुचित चर्चा मे वक्त जाया हो जहाँ !
हरदम भेदाभेद, दौलत की चर्चा हो जहाँ !
ऐसे नातों से, किनारा करते चला गया
करते चला गया, करते चला गया
अपना और पराया कोई माने ना जहाँ !
अपनों के सिवाय औरों की भी चर्चा हो जहाँ !
ऐसी महफिल में, रंग लाता चला गया
रंग लाता चला गया, रंग लाता चला गया।
