STORYMIRROR

दिलीप मुसळे

Abstract

4  

दिलीप मुसळे

Abstract

रिश्ते-नाते

रिश्ते-नाते

1 min
257

(चाल: मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया)

जिंदगी के हर मोड पे मैं रिश्ते जोडता चला गया !

विरासतमे मिलें नाते तोडता चला गया !


प्यार और सोच की हरदम चर्चा हो वहाँ !

उम्र र्और दौलत मे फर्क न महसुस हो जहाँ !

 ऐसे लोगो के साथ जुड़ता चला गया

जुडता चला गया,  जुड़ता चला गया


जात पात की दिवार ना हो जहाँ !

उंच नीच का ना भेद हो जहाँ !

ऊन लोगो की ओर मुडता चला गया

मुडता चला गया, मुडता चला गया


लेनदेन, संकुचित चर्चा मे वक्त जाया हो जहाँ !

हरदम भेदाभेद, दौलत की चर्चा हो जहाँ !

ऐसे नातों से, किनारा करते चला गया

करते चला गया, करते चला गया


अपना और पराया कोई माने ना जहाँ !

अपनों के सिवाय औरों की भी चर्चा हो जहाँ !

ऐसी महफिल में, रंग लाता चला गया

रंग लाता चला गया, रंग लाता चला गया।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from दिलीप मुसळे

Similar hindi poem from Abstract