Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

Harsh Maheshwari

Abstract

5.0  

Harsh Maheshwari

Abstract

फिर भी मुस्कुरा रहे थे

फिर भी मुस्कुरा रहे थे

1 min
273


वक़्त तो सभी देखते हैं 

पर एक वक़्त हमने भी देखा जब हम

भीड़ में धक्के खा रहे थे।


जो मिल रहा था चुपचाप खा रहे थे,

बिना बोले सब कुछ सहे जा रहे थे,

वो माँ का प्यार, वो पिता की डाँट।

 

लिया करते थे सारे सुख दुःख बाँट,

दूर होके अपनों से, उनकी याद में,

सो नही पा रहे थे, पर क्या बताऊँ 

फिर भी मुस्कुरा रहे थे।


पुरानी यादों के सहारे जीते जा रहे थे,

बचपन के दोस्त आज भी याद आ रहे थे,

कुछ अनोखी पहेलियाँ हम भी सुलझा रहे थे,

नए लोगों संग, नया परिवार बना रहे थे।


तकलीफ़ तो होती थी,

पर क्या बताऊँ 

फिर भी मुस्कुरा रहे थे ।


मोटी किताबों का ज्ञान लिए,

हम दुनिया को बता रहे थे,

निकले तो थे सपनों को पूरा करने,

पर भटके रास्तों को भुला रहे थे।


मुश्किलें तो आयी थी बहुत,

पर क्या बताऊँ 

फिर भी मुस्कुरा रहे थे।


Rate this content
Log in