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Aditya Sharma

Abstract

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Aditya Sharma

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नींद और रात

नींद और रात

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हर रात अब ये मन

रात से सवाल करता है

अब तू वो रात क्यों न रही

जब हमें बिस्तर पर पड़ते ही 

नींद आ जाती थी…

कोई कितना भी जगाये

हमारी आँखें खुल न पाती थी….


ऐ रात बता 

अब तू वो क्यों न रही

जब हमें तेरे आने से

चैन आ जाता था

दिमाग हमारा सबकुछ भूल

मन्दमस्त हो जाता था….


ऐ रात बता

अब वो मेरी नींद कहाँ खो गयी है

क्यों मुझे तेरे आने पर अब चैन नहीं आता

क्यों अब मेरी आँखें थकती नहीं है

क्यों अब मेरा बदन

आराम की चाह नहीं करता


ऐ रात बता

अब तू बदल गयी है 

या अब मैं ही मैं न रहा हूँ

कभी कभी तो अब लगता है

मानो मैं ही खुद से जुदा हो चुका हूँ।


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