"नदी की अविरल धारा "
"नदी की अविरल धारा "
मैं नदी की अविरल धारा हूं !
तुम जितने पत्थर फैंकोगे
मैं सारे अपनी तलीं में बिठा दूंगी।।
मैं नदी की अविरल धारा हूं !
मेरे राहों की चट्टानों को कांट छांट
उपजाऊ मैदान बना दूंगी।।
मैं नदी की अविरल धारा हूं !
बंजर भूमि सींच सींच
लहलहाते खेत बना दूंगी।।
मैं नदी की अविरल धारा हूं !
मैं कल कल बहती हुई दुग्ध धारा से
अमृत का पान करा दूंगी।।
मैं नदी की अविरल धारा हूं !
पवित्रता के आंचल से तुझे
पाप मुक्त करा दूंगी।।
