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Ajay Yadav

Inspirational

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Ajay Yadav

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मिट्टी का घड़ा

मिट्टी का घड़ा

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मिट्टी का घड़ा हूँ मैं मेरे भी कुछ अरमान हैं,

लोगों की प्यास बुझाना मिला मूझे ये वरदान है।

करता मैं कठिन तपस्या अग्नी के ताप को सहकर,

जीवन अर्पण कर देता सबको अपना कहकर।

परवाह न की कभी मैनें चिलचिलाती धूप की,

झोंक दिए सारे सपने चाह न की रंग-रूप की।

मन्दिर-मस्जिद या हो गुरुद्वारा प्यास बुझाऊ सारे भक़्त की,

मैं न देखूं जात-पात न जांच करू किसी के रक़्त की।

हृदय मेरा भी तब प्रफुल्लित हो जाता,

हर थका हारा मुझसे अपनी प्यास की तृप्ति पा जाता।

कीमत जाने केवल मेरी मूझे वो बनानेवाला

दिन रात रहे खटता-पिटता वो चाक चलानेवाला।

पर उसे भी कहां मिल पाता हैं उचित दाम 

रुखी-सूखी ही खाकर चलाता है वो अपना काम।

जानता हूं,समझता हूँ बात है ये बेकार की

जब कोई नही सुनता यहां विनती किसी लाचार की।

इस मतलबी दुनियां में कोई नहीं जिसे कहे

अपना स्वार्थ में तोड़ दिए रिश्ते टूट चुका हैं हरेक सपना।

चाह सदा रही हैं मेरी पझरकर किसी के काम आना,

मैं रहूँ न रहूँ इस दुनियां में त्याग-तपस्या किसी ने न पहचाना।

पर जानंगे जिस दिन सारे मेरी चाह को,

समझकर एक दूसरे को चुनेंगे सही राह को।

तब समझूंगा मैं कि जीवन मेरा सफल हो गया,

विनती करूंगा कुम्हार से फिर बना मूझे,फिर रूप दे नया।"


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