मैं पारी हूँ , तेरे आँगन की
मैं पारी हूँ , तेरे आँगन की
मैं पारी हूँ, तेरे आँगन की
ममता की छाओं में, मैं पाली बड़ी
ख्वाबों का आशियाना को, हकीकत कर
भाइयों और बहनो के संग, मैं खेली बड़ी
माँ की सहेली, पिता की पारी बानी
देख उनका दर्द, मैं उनका सहारा बानी
मैं पारी हूँ, तेरे आँगन की
धीरे धीरे न जाने कब, मैं हो गयी बड़ी
ख्वाब संजोये थे, जो माँ - पिता ने मेरे
उस जूनून को लिए, में घर छोड़ आगे चली
खूब पढ़ी मैं, खूब लिखी में
कामयाबी की सीधी को, मैं चूमने लगी
मैं पारी हूँ, तेरे आँगन की
धीरे से न जाने कब, मैं शादी के योग बानी
हुआ उस रात कुछ ऐसा, न में हो पाई खड़ी
डोली की जगह, चार कंधो में मेरी अर्थी चली
नोच खाया मेरे जिस्म को, हवस के शैतानो ने
फेक दिया कचरे में फिर, अपना निशान मिटने में
रूह भी देख मेरे शरीर को, अब कांपती हैं
न्याय दिलाने वाला भी दोषियों को, सजा देने में सोचती हैं
मैं पारी हूँ, तेरे आँगन की
ख्वाबों को अधूरा छोड़, मैं इस दुनिया से चली
एक फरियाद हैं मेरी, देश के जन सब से
पूरी तो नहीं कर सकते मेरी कमी,
पर साथ देना मेरे माँ -पिता का मन से।
