STORYMIRROR

Sudha Talan

Abstract

4  

Sudha Talan

Abstract

माँ

माँ

1 min
359

में सो गयी फिर भी माँ जाग रही थी

सिरहाने पे बैठी मानो मेरी चेहरे पे

पड़ी हर एक शिकन को डांट रही थी।


कभी बाँहो का तकिया,

तो कभी अंचल की चादर

बनाके उड़ा रही थी।


नींदों में मेरा मुड़ना, खिसकना

कभी जाके उस से लिपटना

मेरी हर एक अदा पे माँ मुस्कुरा रही थी।


अपनी कोमल हथेलियों को कभी

चेहरे पे घुमाती, अपनी नरम

उँगलियों से बालो को सहलाती।


मेरी हथेलियों की गर्माहट को

अपने चुम्बन से मिटा रही थी

सवेरा हुआ और आँख खुली,

पर माँ वही सिरहाने पे बैठी

मुझे थपकियाँ दिए जा रही थी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract