माँ की एक कहानी
माँ की एक कहानी
आओ सुनाती हूं तुम्हें, मां की कहानी मेरी जुबानी,
जानते हो क्या, तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार मां ही क्यों करती है?
तुम्हारे अच्छे बुरे कर्मों का फल मां ही क्यों भरती है?
जानते हो क्या, एक मां का प्यार सबसे पवित्र क्यों माना जाता है?
एक मां का ममत्व क्यों सबसे सर्वोपरि कहलाता है?
नौ महीने तुम्हें अपनी कोख में पालना,
कच्चे घड़े सा संस्कारों में ढालना,
उंगली पकड़कर चलना सिखलाना,
गलती करने पर सही राह दिखलाना,
यही तो है एक मां का अफसाना।
शरारत करने पर फटकार लगाना,
अपने हाथों से तुम्हें खाना खिलाना,
संग तुम्हारे बैठ दुख बांट जाना,
सहेली समझ कभी चुगली लगाना,
यही तो है एक मां का अफसाना।
घर का पूरा बोझ अपने कंधों पर उठाना,
सभी मुसीबतें चुप कर के सह जाना,
फिर भी भला बुरा कहलाना,
यही तो है एक मां का अफसाना।
दुनिया की माया से बच्चों को बचाना,
ममता की छाया से उन्हें सहलाना,
सभी के पसंद का खाना बनाना,
यही तो है एक मां का अफसाना।
मकान को घर बनाने में जी जान लगाना,
दूसरों की खुशियों में उसका ढल जाना,
घर आंगन में खुशियां भर लाना,
यही तो है एक मां का अफसाना।
मां,
कहने को तो एक छोटा सा शब्द है,
पर इस छोटे से शब्द में, हम सभी की पूरी दुनिया बसती है,
मन को एक सुकून सा मिल जाता है,
जब वह दिल खोल कर हंसती है।
एक मां ही तो है जो सबके चले जाने के बाद भी साथ खड़ी मिलती है,
हमारे गमों में संग रोती और खुशियों में बसंत के फूलों सी खिलती है।
वैसे तो रब का रूप है मां,
पर अपने आप में ही ममत्व, शीतलता और सादगी का स्वरूप है मां।
घर परिवार के खातिर अपने सपनों को रौंद देती है मां,
नजाने कितने बलिदान, कितने संघर्ष अपने सिर लेती है मां,
रब का दिया वरदान है मैं,
सम्पूर्ण समाज का मान है मां।
मेरी हिस्से की खुशियां भी मां पर कुर्बान है,
मां से ही मेरी आन बान और शान है।
