लम्हें वो बचपन के
लम्हें वो बचपन के
कहकर कुछ बातें आज जज़्बात समझने निकले हैं,
बक्से में बंद वो किताब, फिर से पढ़ने निकले हैं,
आयना सा साफ है आज भी यादों का पिटारा
जिसके कुछ किस्से आज फ़िर गुनगुनाने निकले हैं।।
धुंधले से कुछ लम्हें जिनमें कभी जीना हमने सीखा था
गिरकर कभी रास्ते पर ,फिर उठना हमने सीखा था,
कुछ बच्चों के संग मिलकर तब खेल किए कुछ अनजाने से
उन खेलों को फिर एक बार खेलने निकलें हैं।।
आज देखकर कुछ तस्वीरें वो खुद पर हंसी कुछ आई है,
हम क्या सच में, इतने पागल थे ,सोचकर
वो कहानी फिर याद आयी है,
वो रंगीन सी थी जब दुनिया कभी,
और वो बेपरवाह सी ज़िन्दगी थी बस तभी,
आज उसी अहसास को फिर से खोजने हम निकलें हैं।।
