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Bhupendra Chauhan

Abstract

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Bhupendra Chauhan

Abstract

क्योंकि माँ तो माँ होती हैं

क्योंकि माँ तो माँ होती हैं

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धुंधला सा है वो बचपन का साया 

जब खेल-खेल के मेरे अंतर्मन को भी थकाया

उस वक्त भी वो आँखे निहारती मानवी

पूछती है खाने का मुझे फिर वो खाती है 

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


हाथ में लिये हुए वो एक तख्त भी

पाठशाला में हमारी शान बढ़ता है 

पाठशाला से छूटते ये कदम बढ़ते हैं 

उसी राह पर जँहा फिर वो पूछती है खाने का मुझे

फिर वो खाती हैं क्योंकि माँ तो माँ होती है।


लड़कपन भी क्या अठखेलियाँ खाता था

बंधुओं के साथ बीतता दिन उस कामिनी के 

स्वप्न संजोय रहता था इस बीच में भी वो

पूछती है खाने का मुझे फिर वो खाती है 

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


जवानी की दहलीज ही लील गयी ये किताबें मेरी

दिन को स्वप्न देखते थे और रात को पूरा करते थे

नासमझ थी वो जो उस समय में भी पूछती हैं 

खाने का मुझे फिर वो खाती है 

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


छूट गया वो ज्ञान समन्दर एक अदद सी नोकरी के लिये

छूट गये बचपन के साथी और छूट गया ये शहर सारा

फोन आता था उसका तो वो पूछती हैं

खाने का मुझे फिर वो खाती है

 क्योंकि माँ तो माँ होती है।


नीर से बहते जीवन में जीवनसंगिनी की धारा मिली 

जिम्मेदारियों का बोझ उसका भी कुछ कम हुआ 

उन्माद से भरे इस नासमझ को वो

पूछती हैं खाने का मुझे फिर वो खाती है 

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


समा गया समन्दर नैनो में उसके

नहीं था साथ अब पिता के मेरे

घेर लिया था एक अधूरेपन को हमें

दुःख का अंबार सा लगा था

हिम्मत जुटाती लड़खड़ाती

वो पूछती हैं खाने का मुझे फिर खाती है

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


गूँज उठी थी किलकारियां घर के हर कोने में

डूब रहे थे नयन नन्हे जीवन को रिझाने में

खेली गेंद दिया झूला मिला नया सवेरा

फिर भी पूछती हैं खाने का मुझे फिर वो खाती है

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


घेर लिया था उस काया को रुग्णता की छाया ने

दवा है जरूरी ये में समझाते हुए बहुत रीझता था

जीवन हुआ पूरा ये उसने बस सोचा था पर एक बात जो 

उसके लिए थी जरूरी वो पूछती है खाने का मुझे फिर वो खाती है

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


आँखे उसकी भी थी ठहरी हुई आँखे मेरी भी थी भरी हुई

देख के उसकी अविचलित काया ह्रदय क्रदन से भर आया

चंहु और मची ऊहापोह थी अंतश्चेतना में एक सवाल था आया

वर्षो से बना वो क्रम में क्यों नही रोक पाया पर अब भी लगता हैं मुझे 

जैसे वो पूछती है खाने का मुझे फिर वो खाती है

क्योंकि माँ तो माँ होती है।


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