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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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जयकरी छंद

जयकरी छंद

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चौपई / दीप्ति / जयकरी छंद 
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आप लगाओ जमकर रंग।
मौका है तो कर लो तंग।।
मर्यादा  भी  हो  मत भंग।
नहीं किसी से करना जंग।।

समझो आप महात्मा बुद्ध।
व्यर्थ ठान बैठे क्यों युद्ध।।
धारण उनका  कर संदेश।
नाहक क्या है ये उपदेश।।

आया  नहीं   आपको  ज्ञान।
कितना दिया बुद्ध को मान।।
इसका हम पर  बढ़ता भार।
समझा कब जीवन संसार।।

मिला  गया में  उनको  ज्ञान।
बनी अलग थी तब पहचान।।
दुनिया लेती  बुद्धा का ज्ञान।
हम  क्या हैं  मूरख अज्ञान।।

दिवस मनाते सब मजदूर।
समझा नहीं  नशे में  चूर।।
उड़ा रहे  इनका  उपहास।।
या फिर होता है परिहास।।

करते सभी छंद जागरण।
कुछ लेते न इसका प्रण।।
जैसा जिसका है सिद्धांत।
ज्ञान मिलेगा श्रम उपरांत।।

गुस्से  में  आया  यमराज।
कहा मुझे पहनाओ ताज।।
मैंने कहा और कुछ बोल।
या फिर बैठ बजाओ ढोल।।

अति  देती  है  कष्ट  अपार।
इतना तुम भी समझो यार।।
व्यर्थ  नहीं  करिए  तकरार।
खाना है क्या तुमको मार।।

करते  इतना  अति  विश्वास।
इसीलिए   तो   टूटे   आस।।
अब तो कर लें सोच  विचार।
या  जाकर  बैठो  घर  द्वार।।

उन लोगों का क्या है काम।
जिन्हें चाहिए केवल नाम।।
लगता  उनसे   ही  संसार।
जिसके  वो  हैं  लंबरदार।।

जिससे की थी ज्यादा आस।
उसने  तोड़ा  सब  विश्वास।।
व्यर्थ गया जो किया करार।
हिस्से   आई   भारी   हार।।

कैसा  आया  है  परिणाम।
डूबगया ममता का नाम।।
नहीं रहा अब उनका राज।
दूजा सिर पर भगवा ताज।।

सुधीर श्रीवास्तव


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